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हिंदी दिवस: मूल रूप से फारसी शब्द है ‘हिंदी’, जानिए भाषा से जुड़े रोचक तथ्य

हिंदी की सबसे बड़ी खासियत है कि यह जैसी लिखी जाती है, आमतौर पर वैसी ही पढ़ी भी जाती है। लेकिन इसके उच्चारण में क्षेत्रीयता का पुट और स्थानीय बोलियों का प्रभाव भी दिखाई देता है। यही वजह है कि एक ही शब्द को अलग-अलग क्षेत्रों में बोलने का अंदाज अलग हो सकता है। मानक हिंदी के साथ ब्रज, अवधी, बुंदेली, मालवी और बघेली जैसी बोलियों का प्रभाव हिंदी को और विविध तथा जीवंत बनाता है।
Hindi Diwas

हिंदी दिवस

क्या आप जानते हैं कि ‘हिंदी’ शब्द की जड़ें फारसी भाषा से जुड़ी हैं। दरअसल फारसी में ‘हिंद’ शब्द का इस्तेमाल भारत के लिए किया जाता था और ‘हिंदी’ का अर्थ हिंद से संबंधित यानी भारत से जुड़ा हुआ माना जाता था। समय के साथ यही शब्द यहां विकसित भाषाई रूपों की पहचान बन गया। दिलचस्प बात यह है कि आज जिस हिंदी को हम अपनी रोजमर्रा की भाषा के रूप में जानते हैं, उसकी शब्दावली में संस्कृत के साथ-साथ फारसी, अरबी, तुर्की और अंग्रेजी सहित कई भाषाओं का प्रभाव दिखाई देता है।

आज हम हिंदी दिवस मना रहे हैं। यह दिन हिंदी के प्रचार-प्रसार से जुड़ा अवसर होने के साथ-साथ इस भाषा के लंबे और विविध सफर को जानने का भी मौका देता है। तो आइए जानते हैं हिंदी के इतिहास और स्वरूप से जुड़े कुछ ऐसे तथ्य जो आमतौर पर चर्चा में नहीं आते है।

हिंदी का नाम हमेशा ‘हिंदी’ नहीं था

अब आप ये तो समझ ही गए होंगे कि फारसी में ‘हिंद’ शब्द का मतलब है “सिंधु नदी की भूमि” या “भारत”। इस तरह “हिंदी” शब्द मूल रूप से फारसी (Persian) से आया है। इसी के साथ ये जानना भी दिलचस्प है कि आज जिसे हम हिंदी कहते हैं उसके लिए अलग-अलग दौर में अलग नाम इस्तेमाल होते रहे हैं। हिंदवी, हिंदुई, देहलवी और रेख्ता जैसे नाम इतिहास में मिलते हैं। ‘हिंदी’ शब्द की जड़ ‘हिंद’ से जुड़ी है और इसका शुरुआती इस्तेमाल भारत या हिंद से संबंधित अर्थों में होता था। समय के साथ यह नाम एक व्यापक भाषाई पहचान के रूप में स्थापित हुआ।

हिंदी असल में कई भाषाओं का संगम है

हिंदी की शब्दावली पर नजर डालें तो इसमें कई भाषाओं की छाप दिखाई देती है। ‘किताब’ अरबी मूल का शब्द है, ‘दरवाजा’ फारसी से आया है, जबकि संस्कृत मूल के असंख्य शब्द हिंदी के रोजमर्रा के इस्तेमाल का हिस्सा हैं। अंग्रेजी से आए कई शब्द भी अब हिंदी बोलचाल में इतने सामान्य हो चुके हैं कि उन्हें अलग भाषा का शब्द मानने का अहसास तक नहीं होता। यही वजह है कि हिंदी को सिर्फ एक स्रोत से बनी भाषा के रूप में देखना इसके विकास की पूरी कहानी नहीं बताता है।

संदर्भ के साथ बदलते शाब्दिक अर्थ

हिंदी के कुछ शब्द अपने आप में बेहद रोचक हैं। ‘कल’ इसका शानदार उदाहरण है। यही एक शब्द बीते हुए दिन और आने वाले दिन, दोनों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसका सही अर्थ वाक्य और संदर्भ से समझ आता है। इसी तरह ‘हार’ का अर्थ पराजय भी हो सकता है और गले में पहना जाने वाला आभूषण भी।

‘आप’, ‘तुम’ और ‘तू’ सिर्फ संबोधन नहीं

हिंदी की खासियत सिर्फ शब्दों में नहीं, बल्कि उनके भाव में भी है। किसी व्यक्ति के लिए ‘तू’, ‘तुम’ या ‘आप’ का इस्तेमाल रिश्ते और परिस्थिति के हिसाब से बदल जाता है। ‘आप’ सम्मान का भाव देता है, जबकि ‘तुम’ अपनापन या सामान्य संबोधन दिखा सकता है। ‘तू’ करीबी रिश्ते में स्नेह का भाव भी दे सकता है और दूसरे संदर्भ में असम्मान का।

हिंदी और उर्दू की जड़ें आपस में मिली है

बोलचाल की हिंदी और उर्दू में व्याकरण तथा वाक्य संरचना का बड़ा हिस्सा साझा है। आम बातचीत में दोनों के बीच अंतर कई बार शब्दावली और लिपि के स्तर पर अधिक दिखाई देता है। यही कारण है कि रोजमर्रा की बातचीत में दोनों भाषाओं के शब्द सहज रूप से एक-दूसरे में घुलते-मिलते नजर आते हैं।

देवनागरी हिंदी की पहचान का अहम हिस्सा

हिंदी को देवनागरी लिपि में लिखा जाता है। इस लिपि की पहचान इसकी शिरोरेखा यानी अक्षरों के ऊपर चलने वाली क्षैतिज रेखा से भी होती है। देवनागरी की एक खास विशेषता यह है कि इसमें शब्दों के लिखित रूप और उनके उच्चारण के बीच अपेक्षाकृत स्पष्ट संबंध दिखाई देता है।

क्ष, त्र और ज्ञ को लेकर भी है दिलचस्प मामला

स्कूलों में ‘क्ष’, ‘त्र’ और ‘ज्ञ’ को अक्सर अलग-अलग अक्षरों के रूप में पढ़ाया जाता है, लेकिन भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से ये संयुक्त रूप हैं। जैसे ‘क्ष’ को क् और ष के मेल से बना माना जाता है। यानी हिंदी सीखते समय जिन चीजों को हम सामान्य मानकर आगे बढ़ जाते हैं, उनके पीछे भी भाषा विज्ञान की दिलचस्प कहानी छिपी है।

बोलियों ने सजाई हिंदी की दुनिया

हिंदी का संसार मानक हिंदी तक ही सीमित नहीं रहा है। ब्रज, अवधी, बुंदेली, बघेली, भोजपुरी, हरियाणवी और मालवी जैसी अनेक बोलियों और भाषाई रूपों ने उत्तर और मध्य भारत की भाषाई संस्कृति को समृद्ध किया है। अलग-अलग क्षेत्रों में हिंदी का उच्चारण, शब्द और बोलने का अंदाज बदल जाता है..लेकिन यही विविधता इसकी ताकत भी है।

Shruty Kushwaha
लेखक के बारे में
2001 में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (M.J, Masters of Journalism)। 2001 से 2013 तक ईटीवी हैदराबाद, सहारा न्यूज दिल्ली-भोपाल, लाइव इंडिया मुंबई में कार्य अनुभव। साहित्य पठन-पाठन में विशेष रूचि। View all posts by Shruty Kushwaha
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