नई दिल्ली: संसद के बजट सत्र के बीच लोकसभा में सियासी पारा अचानक चढ़ गया है। विपक्ष ने सीधे लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ ही अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दे दिया है, जिसके बाद स्पीकर ने एक अभूतपूर्व कदम उठाया है। सूत्रों के मुताबिक, ओम बिरला ने फैसला किया है कि जब तक उनके खिलाफ लाए गए इस प्रस्ताव पर सदन में कोई निर्णय नहीं हो जाता, तब तक वह अध्यक्ष की कुर्सी पर नहीं बैठेंगे।
यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि संसदीय नियमों के अनुसार ऐसी कोई बाध्यता नहीं है। इसके बावजूद, स्पीकर ने सदन की कार्यवाही से खुद को तब तक अलग रखने का निर्णय लिया है। बताया जा रहा है कि चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, किसी के भी मनाने पर वह अपने फैसले से पीछे नहीं हटेंगे। मंगलवार को उन्होंने लोकसभा महासचिव को इस नोटिस की जांच करने और नियमानुसार कार्रवाई करने का निर्देश भी दिया।
विपक्ष ने क्यों दिया अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस?
कांग्रेस के नेतृत्व में लगभग 118 विपक्षी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ पक्षपात का आरोप लगाते हुए अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया है। कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने मंगलवार को इस कदम की जानकारी दी।
“आज दोपहर 1:14 बजे, हमने रूल 94C रूल्स एंड प्रोसीजर के तहत स्पीकर के खिलाफ नो-कॉन्फिडेंस मोशन का मोशन दिया।”- गौरव गोगोई, कांग्रेस सांसद
सूत्रों के अनुसार, विपक्ष ने अपने नोटिस में चार प्रमुख घटनाओं का जिक्र किया है, जिनके आधार पर स्पीकर पर भेदभाव करने का आरोप लगाया गया है।
1. राहुल गांधी को बोलने से रोकना: विपक्ष का सबसे बड़ा आरोप यह है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी को सदन में बोलने नहीं दिया गया। आरोप है कि जब गांधी चीन के साथ 2020 के गतिरोध पर पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की एक अप्रकाशित पुस्तक का जिक्र करना चाहते थे, तो उन्हें रोक दिया गया।
2. सांसदों का निलंबन: नोटिस में आठ विपक्षी सांसदों के निलंबन के मुद्दे को भी आधार बनाया गया है।
3. भाजपा सांसद की टिप्पणी: विपक्ष ने इस बात पर भी आपत्ति जताई है कि भाजपा सांसद निशिकांत दुबे को पूर्व प्रधानमंत्रियों के खिलाफ “आपत्तिजनक और व्यक्तिगत हमले” करने की अनुमति दी गई।
4. स्पीकर का बयान: चौथा आरोप स्पीकर ओम बिरला के उस बयान से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने कहा था कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सदन में न आने का आग्रह किया था, क्योंकि उन्हें जानकारी मिली थी कि कुछ कांग्रेस सांसद पीएम की सीट पर आकर कोई अप्रिय घटना कर सकते हैं।
अब आगे क्या होगी प्रक्रिया?
माना जा रहा है कि बजट सत्र के दूसरे चरण के पहले दिन, यानी 9 मार्च को, इस प्रस्ताव पर चर्चा हो सकती है। संसदीय प्रक्रिया के अनुसार, प्रस्ताव को चर्चा के लिए स्वीकार करने से पहले कम से कम 50 सांसदों को इसके समर्थन में खड़ा होना होगा। इसके बाद ही चेयर इस पर चर्चा की अनुमति दे सकती है। इस घटनाक्रम ने सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव को और बढ़ा दिया है।





