नई दिल्ली: भारत में चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों द्वारा किए जाने वाले बेलगाम खर्च पर अब सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती दिखाई है। एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार और भारतीय चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। यह याचिका राजनीतिक दलों के चुनावी खर्च की सीमा तय करने की मांग को लेकर दायर की गई है।
यह मामला गैर-सरकारी संगठन (NGO) ‘कॉमन कॉज’ द्वारा दायर एक जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसमें चुनावी प्रक्रिया में धनबल के बढ़ते प्रभाव पर गहरी चिंता जताई गई है। याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि जब उम्मीदवारों के खर्च की एक सीमा तय है, तो राजनीतिक दलों को असीमित खर्च करने की अनुमति क्यों दी जानी चाहिए?
धनबल लोकतंत्र की बुनियाद को कर रहा कमजोर
प्रशांत भूषण ने अदालत में तर्क दिया कि पार्टियों द्वारा धन का अनियंत्रित उपयोग स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की अवधारणा को कमजोर करता है। उन्होंने इलेक्टोरल बॉन्ड मामले में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें अदालत ने खुद माना था कि असीमित राजनीतिक चंदा और धनबल लोकतांत्रिक प्रक्रिया को विकृत करता है और मतदाताओं के सूचना के अधिकार का हनन करता है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस मुद्दे की व्यावहारिक चुनौतियों पर भी सवाल उठाए। जस्टिस बागची ने कहा कि अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी चुनावी खर्च पर सीमाएं हैं, लेकिन वहां भी उम्मीदवार अपने मित्रों, सहयोगियों या तीसरे पक्ष के जरिए खर्च करने के रास्ते निकाल लेते हैं। इस तरह के खर्च को नियंत्रित करना एक बड़ी चुनौती है।
अदालत का चुनाव सुधारों पर व्यापक नजरिया
यह पहली बार नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी खर्च पर चिंता व्यक्त की है। हाल ही में, मंगलवार को एक अन्य मामले में, अदालत ने चुनाव आयोग को एक IIT स्नातक द्वारा दिए गए सुझावों पर विचार करने का निर्देश दिया था। उस याचिका में भी चुनावों में अत्यधिक खर्च पर अंकुश लगाने के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) बनाने की मांग की गई थी।
उस सुनवाई के दौरान प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने स्पष्ट किया था कि वह तीसरे पक्ष की रिपोर्टों पर पूरी तरह भरोसा नहीं कर सकती, खासकर जब चुनाव आयोग ने उन रिपोर्टों का खंडन किया हो। हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता के सुझावों को विचारणीय माना था। अब ‘कॉमन कॉज’ की याचिका पर नोटिस जारी होने के बाद इस मामले में सभी संबंधित पक्षों को छह सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करना होगा, जिसके बाद इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर आगे की सुनवाई होगी।






