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सुप्रीम कोर्ट ने देश में मतदान अनिवार्य करने की याचिका खारिज की, कहा “वोट देना अधिकार है, किसी को मजबूर नहीं किया जा सकता”

Written by:Shruty Kushwaha
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याचिका में यह मांग भी की गई थी कि वोट न देने वालों को सरकारी सुविधाओं से वंचित किया जाए, जिसे अदालत ने अस्वीकार कर दिया। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि ऐसे नीतिगत निर्णय लेना सरकार और संसद का अधिकार क्षेत्र है, न कि न्यायपालिका का।
सुप्रीम कोर्ट ने देश में मतदान अनिवार्य करने की याचिका खारिज की, कहा “वोट देना अधिकार है, किसी को मजबूर नहीं किया जा सकता”

Supreme Court

देश में मतदान को अनिवार्य बनाने और वोट न देने वालों पर कार्रवाई की मांग को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यह पूरी तरह नीतिगत मामला है और इसमें हस्तक्षेप करना न्यायपालिका के दायरे में नहीं आता।

यह याचिका सामाजिक कार्यकर्ता अजय गोयल द्वारा दायर की गई थी। याचिका में मांग की गई थी कि देश में मतदान को अनिवार्य किया जाए और जो लोग वोट नहीं डालते उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाए। इसके साथ ही यह सुझाव भी दिया गया था कि मतदान न करने वाले नागरिकों को कुछ सरकारी सुविधाओं से भी वंचित किया जाए ताकि लोगों को मतदान के लिए प्रेरित किया जा सके। इसपर अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसे प्रस्तावों पर निर्णय लेना विधायिका का कार्य है..न कि न्यायपालिका का।

सुप्रीम कोर्ट ने वोट को अनिवार्य बनाने की याचिका खारिज की

भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में मतदान को अनिवार्य बनाने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रुख अपनाते हुए हस्तक्षेप से इनकार कर दिया है। इसे लेकर दायर याचिका खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि नागरिकों को वोट देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता क्योंकि यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और नीति निर्माण से जुड़ा विषय है। अदालत ने कहा कि इस विषय पर निर्णय लेना सरकार और संसद का अधिकार क्षेत्र है।

मजबूरी नहीं, अधिकार है मतदान

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां नागरिकों को मतदान का अधिकार दिया गया है लेकिन इसे बाध्यता में नहीं बदला जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि पिछले 75 वर्षों से देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था नागरिकों की समझ और जिम्मेदारी पर आधारित रही है। सीजेआई ने व्यावहारिक उदाहरण देते हुए कहा कि कई बार लोगों के सामने रोज़गार और जीवन-यापन से जुड़ी प्राथमिकताएं होती हैं। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति अपना काम छोड़कर मतदान नहीं कर पाता तो उसे दंडित करना न्यायसंगत नहीं होगा।

मामले की सुनवाई में सीजेआई ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि ऐसी व्यवस्था लागू की जाए तो न्यायाधीशों को भी अपने-अपने राज्यों में जाकर मतदान करना पड़ेगा, भले ही उस दिन न्यायिक कार्य प्रभावित हो। इसपर जस्टिस बागची ने कहा कि न्यायिक कार्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

“मतदान को अनिवार्य बनना सरकार और संसद का विषय”

अदालत ने यह भी दोहराया कि मतदान को अनिवार्य बनाना या इसके उल्लंघन पर दंड तय करना सरकार और संसद का विषय है। न्यायपालिका इस तरह के नीतिगत फैसले नहीं ले सकती। इस मामले में अदालत ने याचिकाकर्ता को संबंधित प्राधिकरण के समक्ष अपनी मांग रखने की छूट दी है।

Shruty Kushwaha
लेखक के बारे में
2001 में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (M.J, Masters of Journalism)। 2001 से 2013 तक ईटीवी हैदराबाद, सहारा न्यूज दिल्ली-भोपाल, लाइव इंडिया मुंबई में कार्य अनुभव। साहित्य पठन-पाठन में विशेष रूचि। View all posts by Shruty Kushwaha
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