कांग्रेस नेता राहुल गांधी को सुप्रीम कोर्ट से उस समय कड़ी फटकार मिली, जब वह अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मानहानि मामले को रद्द कराने की याचिका लेकर पहुंचे थे। यह मामला 2022 की भारत जोड़ो यात्रा के दौरान उनके दिए एक बयान से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि “चीनी सैनिक भारतीय जवानों को पीट रहे हैं और चीन ने 2000 किमी क्षेत्र पर कब्जा कर लिया है।” यह टिप्पणी 16 दिसंबर 2022 को कर्नाटक में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान की गई थी। बयान के बाद, सेना की छवि को नुकसान पहुंचाने के आरोप में लखनऊ की एमपी-एमएलए कोर्ट में राहुल गांधी के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ।
सुप्रीम कोर्ट का तीखा सवाल
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की पीठ ने राहुल गांधी को स्पष्ट शब्दों में कहा कि- “आपको कैसे पता चला कि चीन ने भारत की 2000 वर्ग किलोमीटर जमीन कब्जा ली? क्या आप मौके पर मौजूद थे? आपके पास कौन सा सबूत था?” कोर्ट ने आगे कहा, “जब सीमा पर झड़प होती है, तो दोनों पक्षों को नुकसान पहुंचना कोई असामान्य बात नहीं होती। एक सच्चे भारतीय के नाते, ऐसे गैर-जिम्मेदाराना बयान नहीं दिए जाने चाहिए।”
सेना को किया गया अपमानित
यह मामला बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन के पूर्व निदेशक उदय शंकर श्रीवास्तव द्वारा दर्ज कराया गया था। उनका कहना है कि भारतीय सेना की ओर से 12 दिसंबर 2022 को आधिकारिक बयान दिया गया था, जिसमें यह स्पष्ट किया गया था कि चीनी सैनिकों को भारत ने पीछे धकेल दिया है। इसके बावजूद राहुल गांधी ने सेना पर सवाल उठाए और “जानबूझकर झूठा और अपमानजनक बयान” दिया, जिससे देश की सैन्य प्रतिष्ठा को आघात पहुंचा है। याचिका में कहा गया कि यह बयान सेना और देश के प्रति राहुल की मानसिकता को दर्शाता है।
हाई कोर्ट से नहीं मिली राहत
राहुल गांधी ने इस केस को इलाहाबाद हाई कोर्ट में भी चुनौती दी थी। लेकिन हाई कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि “कोई भी व्यक्ति जो भारतीय सेना का सम्मान करता हो, वह इस बयान से आहत हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की भी एक सीमा होती है।” सुप्रीम कोर्ट में राहुल गांधी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि निचली अदालत ने बिना उनका पक्ष सुने संज्ञान लिया। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपने हाई कोर्ट में यह बात नहीं उठाई, तो अब उसका कोई मतलब नहीं है। सिंघवी को यह स्वीकार करना पड़ा कि यह दलील हाई कोर्ट में नहीं दी गई थी।
सोशल मीडिया पर बयान क्यों
कोर्ट की सुनवाई के दौरान यह भी सवाल उठा कि राहुल गांधी ने यह गंभीर आरोप सोशल मीडिया और प्रेस में क्यों रखा, जबकि वह सांसद हैं और विपक्ष के वरिष्ठ नेता भी हैं। कोर्ट ने कहा “आप संसद में यह मुद्दा उठाते, तो एक जिम्मेदार नेता की छवि बनती। लेकिन आपने सीधे सोशल मीडिया का सहारा लिया। इसका क्या उद्देश्य था?” सुनवाई करीब 5 मिनट चली, जिसके अंत में कोर्ट ने शिकायतकर्ता और उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया और जवाब मांगा। साथ ही लखनऊ की एमपी/एमएलए कोर्ट में चल रही कार्यवाही पर फिलहाल स्थगन (Stay) लगा दिया गया है। अब यह मामला सितंबर में दोबारा सुप्रीम कोर्ट में सुना जाएगा।
बन सकती है कानूनी परेशानी
राहुल गांधी का बयान, जो शायद राजनीतिक रणनीति का हिस्सा था, अब उनके लिए कानूनी संकट में तब्दील हो चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को केवल अभिव्यक्ति की आज़ादी के दायरे में नहीं माना, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सेना की प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा। कोर्ट की टिप्पणी ने यह संकेत दे दिया है कि जनता के प्रतिनिधियों को अपने शब्दों की गंभीरता समझनी होगी। अब सबकी निगाहें सितंबर की सुनवाई पर होंगी, जहां यह तय होगा कि क्या राहुल गांधी के खिलाफ यह केस आगे बढ़ेगा या सुप्रीम कोर्ट से उन्हें राहत मिलेगी।





