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बेमौसम बारिश से अफीम की फसल बचाने के लिए किसानों का अनोखा जुगाड़, डोडों पर लगा रहे प्लास्टिक के गिलास, पढ़ें पूरी खबर

Reported by:Kamlesh Sarda|Edited by:Gaurav Sharma
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मध्य प्रदेश के नीमच जिले में बेमौसम बारिश ने अफीम किसानों की चिंता बढ़ा दी है। अपनी कीमती फसल 'काला सोना' को सड़न और नुकसान से बचाने तथा सरकारी लाइसेंस की शर्तों को पूरा करने के लिए किसान एक अनोखा देसी तरीका अपना रहे हैं, जिसमें वे अफीम के डोडों को प्लास्टिक के गिलासों से ढंक रहे हैं।
बेमौसम बारिश से अफीम की फसल बचाने के लिए किसानों का अनोखा जुगाड़, डोडों पर लगा रहे प्लास्टिक के गिलास, पढ़ें पूरी खबर

नीमच। मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में, खासकर नीमच जिले के खेतों में इन दिनों एक हैरान करने वाला नजारा दिख रहा है। अफीम के पौधों पर फूलों की जगह प्लास्टिक के उल्टे गिलास लगे हुए हैं। यह कोई सजावट नहीं, बल्कि किसानों का वह देसी जुगाड़ है, जिससे वे अपनी साल भर की मेहनत और ‘काले सोने’ को आसमानी आफत से बचाने की जद्दोजहद कर रहे हैं। बेमौसम बारिश और नमी ने अफीम की फसल पर बड़ा संकट खड़ा कर दिया है।

अफीम की खेती में सबसे महत्वपूर्ण चरण तब आता है, जब डोडों पर चीरा लगाकर उनसे दूध (लेटेक्स) निकाला जाता है। इसी लेटेक्स से अफीम बनती है। लेकिन, अगर इस प्रक्रिया के दौरान बारिश हो जाए तो सारा दूध धुल जाता है और फसल बर्बाद हो जाती है। इसी नुकसान से बचने के लिए किसानों ने यह अनोखा तरीका ईजाद किया है।

कैसे काम करता है यह ‘ग्लास प्रोटेक्शन सिस्टम’?

किसान अफीम के डोडे पर चीरा (लेंसिंग) लगाने के तुरंत बाद, उसे एक उल्टे प्लास्टिक के गिलास से ढंक देते हैं। यह गिलास एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है। यह बारिश की बूंदों को सीधे डोडे और उस पर निकल रहे लेटेक्स के संपर्क में आने से रोकता है। इससे लेटेक्स सुरक्षित रहता है और उसकी गुणवत्ता भी बनी रहती है। किसान राधेश्याम प्रजापति बताते हैं कि यह पूरी तरह से एक नया तरीका है, जिसे लगातार हो रही बरसात से दूध को बचाने के लिए अपनाया गया है।

“लगातार बरसात के चलते अफीम के डोडे को बचाने के लिए प्लास्टिक की गिलास का उपयोग कर उसके दूध को बचाया जा रहा है। यह नया तरीका ईजाद किया है।”- राधेश्याम प्रजापति, मोड़ी

सिर्फ बारिश ही नहीं, यह जुगाड़ फसल को फंगल संक्रमण से भी बचाने में मददगार साबित हो रहा है। खेतों में ज्यादा नमी से झुलसा या काले धब्बे जैसे रोग लगने का खतरा बढ़ जाता है, जिससे पौधे सड़ सकते हैं। गिलास डोडे को अतिरिक्त नमी से भी बचाता है। कुछ किसान जो अधिक खर्च कर सकते हैं, वे ओलों और तेज बारिश से बचाव के लिए पूरे खेत को नेट या पारदर्शी प्लास्टिक की चादर से भी ढंक रहे हैं।

पट्टा बचाने की जद्दोजहद और सरकारी नियम

किसानों की यह सारी कवायद सिर्फ फसल बचाने के लिए नहीं, बल्कि अपना अफीम का पट्टा (लाइसेंस) बचाने के लिए भी है। सरकार की नीति के अनुसार, हर किसान को एक न्यूनतम अर्हक उपज (MQY) जमा करनी होती है। उदाहरण के लिए, एक श्रेणी के तहत किसानों को 5.9 किलोग्राम मॉर्फिन प्रति हेक्टेयर सरकार को देना अनिवार्य है।

बारिश का पानी लगने से अफीम के दूध की मात्रा तो घटती ही है, साथ ही उसकी गुणवत्ता यानी मॉर्फिन का प्रतिशत भी कम हो जाता है। यदि कोई किसान निर्धारित MQY जमा नहीं कर पाता, तो उसका लाइसेंस रद्द हो सकता है या उसे सीपीएस (CPS) पद्धति में स्थानांतरित किया जा सकता है। यही कारण है कि नीमच जिले के लगभग 14,000 से अधिक लाइसेंसधारी किसान दिन-रात अपनी फसल की निगरानी कर रहे हैं और उसे बचाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं।

“फसल के संक्रमण से बचने के लिए डोड पर ग्लास लगाना भी एक प्रयोग है जिसे हम कर रहे हैं जिससे संक्रमण भी बच सकता है।”- लाभचंद धाकड़, केसरपुरा

केंद्र सरकार की नई अफीम नीति के तहत मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में करीब 1.21 लाख किसानों को पट्टे जारी किए गए हैं। शुरुआत में अच्छे मौसम से बंपर पैदावार की उम्मीद थी, लेकिन अब बेमौसम बारिश ने किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं।

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Gaurav Sharma
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