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भीलवाड़ा के पंचमुखी मोक्षधाम में चिता की भस्म से खेली गई अनूठी होली, भैरव बाबा के जयकारों के बीच 18 साल से जारी है परंपरा

Written by:Rishabh Namdev
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राजस्थान के भीलवाड़ा में होली पर एक अनोखी और सदियों पुरानी परंपरा का निर्वहन किया गया, जहां पंचमुखी मोक्षधाम में सैकड़ों श्रद्धालुओं ने रंगों की बजाय चिता की भस्म से होली खेली। आधी रात को 'जय भैरव बाबा' के जयकारों के बीच यह आयोजन पिछले 18 वर्षों से निरंतर जारी है।
भीलवाड़ा के पंचमुखी मोक्षधाम में चिता की भस्म से खेली गई अनूठी होली, भैरव बाबा के जयकारों के बीच 18 साल से जारी है परंपरा

होली का त्योहार जहां पूरे देश में रंगों और गुलाल के साथ मनाया जाता है, वहीं राजस्थान के भीलवाड़ा शहर में एक ऐसी तस्वीर देखने को मिली जो आस्था और परंपरा का अद्भुत संगम है। यहां के पंचमुखी मोक्षधाम में आधी रात को सैकड़ों लोग जुटे और एक-दूसरे को रंग नहीं, बल्कि चिता की भस्म लगाकर होली मनाई। यह दृश्य काशी के मणिकर्णिका घाट की याद दिलाता है, जहां मसाने की होली विश्व प्रसिद्ध है।

जिस श्मशान में लोग दिन के उजाले में भी जाने से कतराते हैं, वहां होली की रात का नजारा बिल्कुल अलग था। ढोल-नगाड़ों की गूंज, डीजे पर बजते भक्ति गीत, हाथों में मशालें और ‘जय भैरव बाबा’ के जयकारे लगाते श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बन रहा था। बच्चे, महिलाएं और पुरुष, सभी इस अनूठी परंपरा का हिस्सा बनने के लिए बड़ी संख्या में पहुंचे थे।

18 वर्षों से चली आ रही परंपरा

यह आयोजन शहर के प्राचीन श्री मसानिया भैरवनाथ मंदिर से शुरू हुआ। यहां से भैरव बाबा की भव्य पालकी निकाली गई, जो पूरे मोक्षधाम परिसर में घूमी। समिति के अध्यक्ष रवि कुमार ने बताया कि यह परंपरा पिछले 18 वर्षों से लगातार निभाई जा रही है। उन्होंने कहा, “सबसे पहले श्मशान की राख से तैयार भस्म बाबा भैरवनाथ को अर्पित की जाती है। इसके बाद यही भस्म प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं में बांटी जाती है, जिससे वे होली खेलते हैं।”

कार्यक्रम देर रात तक चलता रहा, जिसमें श्रद्धालु डीजे की धुन पर झूमते नजर आए। कुछ लोग पारंपरिक वेशभूषा में हाथों में तलवार और कटार लेकर नृत्य भी कर रहे थे, जिससे माहौल पूरी तरह भक्तिमय हो गया।

क्या है इस भस्म होली का धार्मिक महत्व?

इस अनूठी होली के पीछे गहरी धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हैं। मंदिर के पुजारी संतोष कुमार के अनुसार, चिता भस्म को भगवान शिव का श्रृंगार माना जाता है। उनका मानना है कि इस भस्म को बाबा को अर्पित करने और प्रसाद के रूप में ग्रहण करने से व्यक्ति के जीवन से काल, क्लेश, रोग और सभी प्रकार के दोषों का नाश होता है।

“श्रद्धालु मानते हैं कि इस भस्म को प्रसाद स्वरूप घर ले जाने से सुख-समृद्धि का वास होता है। बाबा भैरव नाथ उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।” — एक श्रद्धालु

यही वजह है कि भक्तों को इस दिन का पूरे साल इंतजार रहता है। वे न केवल होली खेलने आते हैं, बल्कि प्रसाद के रूप में भस्म को अपने साथ घर भी ले जाते हैं। यह परंपरा अब भीलवाड़ा के बाहर भी प्रसिद्ध हो चुकी है और हर साल इसमें शामिल होने वालों की संख्या बढ़ रही है।

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Rishabh Namdev
लेखक के बारे में
मैं ऋषभ नामदेव खेल से लेकर राजनीति तक हर तरह की खबर लिखने में सक्षम हूं। मैं जर्नलिज्म की फील्ड में पिछले 4 साल से काम कर रहा हूं। View all posts by Rishabh Namdev
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