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रतलाम में साइबर ठगी का बड़ा खेल! बिना कॉल और OTP के पटवारी के खाते से उड़ाए 2.93 लाख रुपये

Written by:Bhawna Choubey
Published:
रतलाम में साइबर ठगी का ऐसा मामला सामने आया है, जिसने हर बैंक यूजर की चिंता बढ़ा दी है। बिना कॉल, ओटीपी और लिंक शेयर किए पटवारी के खाते से लाखों रुपये गायब हो गए। अब रिमोट एक्सेस और मोबाइल हैकिंग की आशंका जताई जा रही है।
रतलाम में साइबर ठगी का बड़ा खेल! बिना कॉल और OTP के पटवारी के खाते से उड़ाए 2.93 लाख रुपये

रतलाम में सामने आए इस साइबर फ्रॉड केस ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। आमतौर पर लोग मानते हैं कि जब तक ओटीपी शेयर न किया जाए या किसी फर्जी लिंक पर क्लिक न किया जाए, तब तक बैंक खाता सुरक्षित रहता है। लेकिन इस मामले ने उस भरोसे को हिला दिया है। यहां एक पटवारी के बैंक खाते से बिना किसी कॉल और बिना ओटीपी बताए ही करीब 2.93 लाख रुपये निकाल लिए गए।

सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि पीड़ित को ठगी की भनक तक नहीं लगी। तीन दिनों तक खाते से अलग-अलग ट्रांजेक्शन होते रहे और उन्हें इसकी जानकारी तब हुई जब उन्होंने खुद बैंक बैलेंस चेक किया। अब पुलिस और साइबर सेल इस पूरे मामले की जांच में जुटी है। शुरुआती जांच में रिमोट एक्सेस, मोबाइल हैकिंग और साइबर निगरानी जैसी तकनीकों के इस्तेमाल की आशंका जताई जा रही है।

रतलाम में कैसे हुई लाखों की साइबर ठगी?

जानकारी के अनुसार काटजू नगर निवासी अशोक कुमार योगी राजस्व विभाग में पटवारी हैं। उन्होंने कुछ समय पहले पारिवारिक जरूरतों के लिए अपने जीपीएफ खाते से पांच लाख रुपये निकाले थे। यह राशि उनके एसबीआई खाते में जमा थी। इसी खाते पर साइबर ठगों की नजर पड़ गई।

27 अप्रैल को खाते से पहली बार 98 हजार रुपये निकाले गए। इसके अगले दिन 97 हजार 1 रुपये और फिर 29 अप्रैल को दोबारा 98 हजार रुपये ट्रांसफर कर लिए गए। इस तरह कुल 2 लाख 93 हजार 1 रुपये खाते से गायब हो गए। हैरानी की बात यह रही कि इस दौरान न कोई फोन आया, न कोई ओटीपी मांगा गया और न ही किसी बैंक कर्मचारी के नाम पर कॉल की गई।

पीड़ित ने जब 30 अप्रैल को अपना बैंक बैलेंस चेक किया, तब उन्हें ठगी का पता चला। इसके बाद उन्होंने तुरंत साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज करवाई। पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

बिना ओटीपी के खाते से पैसे कैसे निकल जाते हैं?

साइबर विशेषज्ञों के अनुसार आजकल ठग सिर्फ ओटीपी के भरोसे नहीं रहते। अब वे मोबाइल का रिमोट एक्सेस हासिल कर लेते हैं। कई बार लोग किसी वेबसाइट, विज्ञापन या अनजान लिंक पर क्लिक कर देते हैं। इसी दौरान मोबाइल में ऐसा सॉफ्टवेयर एक्टिव हो जाता है, जिससे ठग फोन की गतिविधियों पर नजर रखने लगते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि कई फर्जी ऐप्स और स्क्रीन शेयरिंग एप्लिकेशन मोबाइल की बैंकिंग जानकारी रिकॉर्ड कर लेते हैं। इसके बाद ठग सही समय का इंतजार करते हैं। जब उन्हें बैंक पासवर्ड, यूपीआई पिन या अन्य जानकारी मिल जाती है, तब वे खाते से पैसे निकाल लेते हैं।

इस मामले में भी ऐसी ही आशंका जताई जा रही है। साइबर सेल का मानना है कि पीड़ित के मोबाइल का रिमोट एक्सेस किसी तरीके से ठगों तक पहुंच गया होगा। यही वजह है कि बिना कॉल और बिना ओटीपी के ट्रांजेक्शन संभव हो पाए।

साइबर ठगों के नए तरीके ने बढ़ाई चिंता

पहले साइबर ठगी ज्यादातर फर्जी कॉल या लिंक तक सीमित रहती थी। लेकिन अब तकनीक बदल चुकी है। ठग अब सीधे मोबाइल सिस्टम में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं। यही वजह है कि कई लोग बिना गलती किए भी ठगी का शिकार हो रहे हैं। साइबर एक्सपर्ट बताते हैं कि आजकल पांच तरीके सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जा रहे हैं।

सिम स्वैपिंग
इसमें ठग मोबाइल नंबर का डुप्लीकेट सिम निकलवा लेते हैं। इसके बाद ओटीपी उनके पास पहुंचने लगता है।

रिमोट एक्सेस ऐप
कई बार लोग अनजाने में ऐसा ऐप डाउनलोड कर लेते हैं जो मोबाइल की स्क्रीन रिकॉर्ड करता रहता है।

मोबाइल मैलवेयर
फर्जी वेबसाइट या लिंक के जरिए फोन में वायरस आ जाता है, जो बैंकिंग जानकारी चोरी कर लेता है।

इंटरनेट बैंकिंग हैक
अगर किसी वेबसाइट से यूजरनेम या पासवर्ड लीक हो जाए तो ठग खाते तक पहुंच बना लेते हैं।

कार्ड क्लोनिंग
एटीएम या डेबिट कार्ड की जानकारी कॉपी कर फर्जी ट्रांजेक्शन किए जाते हैं।

Bhawna Choubey
लेखक के बारे में
मुझे लगता है कि कलम में बहुत ताकत होती है और खबरें हमेशा सच सामने लाती हैं। इसी सच्चाई को सीखने और समझने के लिए मैं रोज़ाना पत्रकारिता के नए पहलुओं को सीखती हूँ। View all posts by Bhawna Choubey
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