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मां कालरात्रि की कृपा से दूर होंगे सभी दोष, सिर्फ एक काम से मिलेगा अपार फल

Written by:Bhawna Choubey
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Chaitra Navratri: चैत्र नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा की जाती है। यह दिन विशेष रूप से नकारात्मक ऊर्जा, रोग और सभी प्रकार के दोषों को दूर करने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। मां कालरात्रि अपने भक्तों को भयमुक्त करती हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं।

Chaitra Navratri: नवरात्रि पवित्र समय होता है, जिसमें माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। इस दौरान भक्त उपवास रखते हैं और माँ की कृपा के लिए विशेष अनुष्ठान करते हैं। हर दिन माँ के अलग अलग स्वरूप की आराधना की जाती है, जिससे भक्तों को सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

नवरात्र के सातवें दिन माँ कालरात्रि की पूजा की जाती है। यह रोग माँ पार्वती का ही एक शक्तिशाली रूप है, जो बुरी शक्तियों का नाश करता है। ऐसा माना जाता है कि माँ कालरात्रि की उपासना से सभी प्रकार की भाई और नकारात्मक ऊर्जा दूर हो जाती है, जो व्यक्ति सच्चे मन से माँ की आराधना करता है, उसे जीवन में सफलता और आत्मविश्वास की प्राप्ति होती है।

कैसे करें माँ कालरात्रि की पूजा?

  • सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद माँ कालरात्रि की पूजा का संकल्प लें।
  • किसी स्वच्छ स्थान पर माँ कालरात्रि की मूर्ति या फिर चित्र स्थापित करें।
  • पूजा स्थल पर कलश स्थापित करें और घी या तेल का दीपक जलाएं।
  • माँ को लाल रंग के फूल, अक्षत और गंगाजल अर्पित करें।
  • पूजा के दौरान धूप, दीप और अगरबत्ती जलाकर माँ को समर्पित करें।
  • माँ कालरात्रि को गुड़ और नारियल का भोग लगाएं।

मां कालरात्रि चालीसा

॥॥दोहा ॥॥

जयकाली कलिमलहरण, महिमा अगम अपार

महिष मर्दिनी कालिका, देहु अभय अपार ॥

अरि मद मान मिटावन हारी । मुण्डमाल गल सोहत प्यारी ॥

अष्टभुजी सुखदायक माता । दुष्टदलन जग में विख्याता ॥1॥

भाल विशाल मुकुट छवि छाजै । कर में शीश शत्रु का साजै ॥

दूजे हाथ लिए मधु प्याला । हाथ तीसरे सोहत भाला ॥2॥

चौथे खप्पर खड्ग कर पांचे । छठे त्रिशूल शत्रु बल जांचे ॥

सप्तम करदमकत असि प्यारी । शोभा अद्भुत मात तुम्हारी ॥3॥

अष्टम कर भक्तन वर दाता । जग मनहरण रूप ये माता ॥

भक्तन में अनुरक्त भवानी । निशदिन रटें ॠषी-मुनि ज्ञानी ॥4॥

महशक्ति अति प्रबल पुनीता । तू ही काली तू ही सीता ॥

पतित तारिणी हे जग पालक । कल्याणी पापी कुल घालक ॥5॥

शेष सुरेश न पावत पारा । गौरी रूप धर्यो इक बारा ॥

तुम समान दाता नहिं दूजा । विधिवत करें भक्तजन पूजा ॥6॥

रूप भयंकर जब तुम धारा । दुष्टदलन कीन्हेहु संहारा ॥

नाम अनेकन मात तुम्हारे । भक्तजनों के संकट टारे ॥7॥

कलि के कष्ट कलेशन हरनी । भव भय मोचन मंगल करनी ॥

महिमा अगम वेद यश गावैं । नारद शारद पार न पावैं ॥8॥

भू पर भार बढ्यौ जब भारी । तब तब तुम प्रकटीं महतारी ॥

आदि अनादि अभय वरदाता । विश्वविदित भव संकट त्राता ॥9॥

कुसमय नाम तुम्हारौ लीन्हा । उसको सदा अभय वर दीन्हा ॥

ध्यान धरें श्रुति शेष सुरेशा । काल रूप लखि तुमरो भेषा ॥10॥

कलुआ भैंरों संग तुम्हारे । अरि हित रूप भयानक धारे ॥

सेवक लांगुर रहत अगारी । चौसठ जोगन आज्ञाकारी ॥11॥

त्रेता में रघुवर हित आई । दशकंधर की सैन नसाई ॥

खेला रण का खेल निराला । भरा मांस-मज्जा से प्याला ॥12॥

रौद्र रूप लखि दानव भागे । कियौ गवन भवन निज त्यागे ॥

तब ऐसौ तामस चढ़ आयो । स्वजन विजन को भेद भुलायो ॥13॥

ये बालक लखि शंकर आए । राह रोक चरनन में धाए ॥

तब मुख जीभ निकर जो आई । यही रूप प्रचलित है माई ॥14।

बाढ्यो महिषासुर मद भारी । पीड़ित किए सकल नर-नारी ॥

करूण पुकार सुनी भक्तन की । पीर मिटावन हित जन-जन की ॥15॥

तब प्रगटी निज सैन समेता । नाम पड़ा मां महिष विजेता ॥

शुंभ निशुंभ हने छन माहीं । तुम सम जग दूसर कोउ नाहीं ॥16॥

मान मथनहारी खल दल के । सदा सहायक भक्त विकल के ॥

दीन विहीन करैं नित सेवा । पावैं मनवांछित फल मेवा ॥17॥

संकट में जो सुमिरन करहीं । उनके कष्ट मातु तुम हरहीं ॥

प्रेम सहित जो कीरति गावैं । भव बन्धन सों मुक्ती पावैं ॥18॥

काली चालीसा जो पढ़हीं । स्वर्गलोक बिनु बंधन चढ़हीं ॥

दया दृष्टि हेरौ जगदम्बा । केहि कारण मां कियौ विलम्बा ॥19॥

करहु मातु भक्तन रखवाली । जयति जयति काली कंकाली ॥

सेवक दीन अनाथ अनारी । भक्तिभाव युति शरण तुम्हारी ॥20॥

॥॥दोहा॥॥

प्रेम सहित जो करे, काली चालीसा पाठ ।

तिनकी पूरन कामना, होय सकल जग ठाठ ॥

Bhawna Choubey
लेखक के बारे में
मुझे लगता है कि कलम में बहुत ताकत होती है और खबरें हमेशा सच सामने लाती हैं। इसी सच्चाई को सीखने और समझने के लिए मैं रोज़ाना पत्रकारिता के नए पहलुओं को सीखती हूँ। View all posts by Bhawna Choubey
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