सनातन धर्म में विवाह केवल साथ रहने का संबंध नहीं, बल्कि दो आत्माओं का आध्यात्मिक बंधन माना गया है। पति और पत्नी का रिश्ता जन्म-जन्मांतर तक जुड़ा हुआ बताया गया है। इसी रिश्ते को लेकर लोगों के मन में कई सवाल उठते रहते हैं, जिनमें सबसे बड़ा सवाल यही है कि पति के पुण्य का फल पत्नी को तो मिलता है, लेकिन पत्नी के पुण्य का फल पति को क्यों नहीं मिलता।
हाल ही में वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज से एक भक्त ने यही प्रश्न पूछा। महाराज ने इस प्रश्न का उत्तर इतनी सरल और गहरी भाषा में दिया कि सुनने वालों को सनातन धर्म के विवाह और कर्म सिद्धांत का वास्तविक अर्थ समझ में आ गया।
सनातन धर्म में पति-पत्नी का आध्यात्मिक संबंध
सनातन धर्म में पति-पत्नी के रिश्ते को केवल सामाजिक व्यवस्था नहीं माना गया है। शास्त्रीय परंपराओं और संतों की व्याख्याओं में ऐसा माना गया है कि धर्म, कर्म और मोक्ष से जोड़ा गया है। पत्नी को पति की अर्धांगिनी कहा गया है, यानी वह केवल जीवनसाथी नहीं, बल्कि उसके आधे अस्तित्व की भागीदार होती है। इस रिश्ते में केवल भावनाएं नहीं, बल्कि जिम्मेदारियां भी बराबर बंटी होती हैं। लेकिन पुण्य के बंटवारे को लेकर जो व्यवस्था बनाई गई है, उसके पीछे एक गहरा आध्यात्मिक तर्क छिपा है, जिसे समझना जरूरी है।
पाणिग्रहण संस्कार का असली अर्थ क्या है
प्रेमानंद महाराज ने बताया कि इस प्रश्न का उत्तर विवाह के समय होने वाले पाणिग्रहण संस्कार में छिपा हुआ है। विवाह के दौरान जब पति और पत्नी अग्नि के सामने एक-दूसरे का हाथ पकड़ते हैं, तो यह केवल रस्म नहीं होती। इस संस्कार में पति का हाथ नीचे और पत्नी का हाथ ऊपर होता है। इसका अर्थ है कि पति यह संकल्प लेता है कि अब से वह पत्नी के जीवन, सुरक्षा और कल्याण की पूरी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले रहा है। ऐसी मान्यता प्रचलित है कि पत्नी को पति के पुण्य में सहभागिता प्राप्त होती है।
पति का पुण्य पत्नी को क्यों मिलता है
प्रेमानंद महाराज के अनुसार, एक स्त्री विवाह के बाद अपना घर, माता-पिता, भाई-बहन और अपना पूरा संसार छोड़कर पति के घर आती है। वह अपने जीवन को पति के जीवन से जोड़ लेती है और उसकी सेवा, सहयोग और व्यवस्था संभालती है। जब पति कोई धार्मिक कार्य करता है जैसे दान, व्रत, यज्ञ, तीर्थ यात्रा या भजन तो उसके पीछे पत्नी का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष योगदान होता है। शास्त्रों के अनुसार, पति के हर शुभ कर्म में पत्नी की सहभागिता मानी जाती है। इसी कारण पति के पुण्य का आधा फल पत्नी को अपने आप मिल जाता है।
क्या यह व्यवस्था स्त्री को कमजोर बनाती है?
प्रेमानंद महाराज ने इस भ्रम को भी दूर किया कि यह व्यवस्था स्त्री को कमजोर या कमतर बनाती है। उन्होंने साफ कहा कि यह कोई असमानता नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का सिद्धांत है। पति पर पत्नी की रक्षा और पालन की जिम्मेदारी होती है, इसलिए उसके पुण्य में पत्नी की भागीदारी मानी गई है। यह व्यवस्था त्याग और समर्पण पर आधारित है, न कि किसी प्रकार के भेदभाव पर।
पत्नी का पुण्य पति को क्यों नहीं मिलता
यहीं पर प्रेमानंद महाराज ने सबसे महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने बताया कि पुण्य का फल और आत्मिक उन्नति दो अलग बातें हैं। पत्नी का पुण्य पति को तभी मिलता है, जब पति स्वयं धर्म के मार्ग पर चल रहा हो। यदि पति अधर्मी है, गलत कर्मों में लिप्त है और पत्नी चुपचाप अपना जप-तप और भक्ति कर रही है, तो उस पुण्य का फल पति को नहीं मिलेगा। ऐसी स्थिति में पत्नी अपने पुण्य के बल पर उन्नति करेगी, लेकिन पति को अपने कर्मों का फल खुद भुगतना पड़ेगा।
जब पति धार्मिक हो, तब क्या होता है
प्रेमानंद महाराज के अनुसार, यदि पति स्वयं भजन करने वाला, धर्म का पालन करने वाला और ईश्वर में विश्वास रखने वाला है, और पत्नी निस्वार्थ भाव से उसकी सेवा करती है, तो उस स्थिति में पति के भजन और पुण्य का प्रभाव पत्नी के जीवन में भी दिखता है। ऐसे दांपत्य जीवन में दोनों एक-दूसरे की आध्यात्मिक उन्नति में सहायक बनते हैं।
पुण्य साझा हो सकता है, मुक्ति नहीं
महाराज ने बहुत सरल शब्दों में कहा कि पुण्य साझा किया जा सकता है, लेकिन मोक्ष या आत्मिक मुक्ति नहीं। हर आत्मा को अपनी साधना खुद करनी होती है। पत्नी की भक्ति पत्नी को ऊपर उठाएगी, और पति की साधना पति को। कोई भी व्यक्ति दूसरे की भक्ति पर पूरी तरह निर्भर नहीं रह सकता।
पाप और दंड का सिद्धांत
प्रेमानंद महाराज ने यह भी स्पष्ट किया कि पाप के मामले में कोई साझेदारी नहीं होती। न तो पति के पाप का दंड पत्नी को मिलता है और न ही पत्नी के पाप का फल पति को। अगर दोनों एक-दूसरे के गलत कार्यों में शामिल नहीं हैं, तो हर व्यक्ति अपने कर्मों का फल खुद भोगता है। यही सनातन धर्म का न्यायपूर्ण सिद्धांत है।
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