होली का त्योहार आते ही रंग, गुलाल और उत्साह का माहौल बन जाता है। लेकिन उज्जैन के विश्व प्रसिद्ध महाकाल मंदिर में इस बार होली खास तरीके से मनाई जा रही है। यहां भक्त रंगों से नहीं, बल्कि नियमों और परंपराओं के साथ होली का आनंद लेंगे।
ज्योतिर्लिंग महाकाल मंदिर में सबसे पहले भगवान महाकाल के साथ रंगोत्सव मनाया गया। संध्या आरती के दौरान शक्कर से बनी माला पहनाई गई और हर्बल गुलाल अर्पित कर पूजा संपन्न हुई। हालांकि मंदिर परिसर में पुजारी, पुरोहित, सेवक और श्रद्धालुओं के रंग खेलने पर पूरी तरह प्रतिबंध रहेगा।
संध्या आरती में मनाया गया प्रतीकात्मक रंगोत्सव
महाकाल मंदिर में होली की शुरुआत संध्या आरती से हुई। भगवान महाकाल को पहले शक्कर से बनी विशेष माला पहनाई गई। इसके बाद हर्बल गुलाल अर्पित कर आरती की गई।
मंदिर प्रशासन के अनुसार यह रंगोत्सव पूरी तरह प्रतीकात्मक होता है। यहां परंपरा के अनुसार भगवान को गुलाल चढ़ाया जाता है, लेकिन किसी प्रकार का हुड़दंग या रंगों की छींटाकशी नहीं होती।
आरती के बाद पुजारियों ने मंदिर परिसर में होलिका का पूजन किया और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ विधिवत दहन किया। यह पूरा आयोजन अनुशासन और मर्यादा के साथ संपन्न हुआ।
महाकाल मंदिर में होली खेलने पर प्रतिबंध क्यों?
मंदिर प्रशासन ने साफ किया है कि होली के दौरान पुजारी, पुरोहित, उनके सेवक और आम श्रद्धालु रंग नहीं खेल सकेंगे। कोई भी व्यक्ति मंदिर परिसर में रंग, गुलाल, पिचकारी, प्रेशर गन या रंग के सिलेंडर लेकर प्रवेश नहीं कर पाएगा। मंदिर में श्रद्धालुओं को प्रवेश से पहले कड़ी जांच से गुजरना होगा। पुलिस और सुरक्षा कर्मी हर प्रवेश द्वार पर तैनात रहेंगे। महाकाल मंदिर में होली पर प्रतिबंध का मुख्य उद्देश्य मंदिर की पवित्रता और सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखना है।
सुरक्षा के कड़े इंतजाम, पुलिस की पैनी नजर
होली के दौरान मंदिर में भीड़ बढ़ जाती है। इसे देखते हुए प्रशासन ने विशेष सुरक्षा योजना बनाई है। प्रवेश द्वारों पर मेटल डिटेक्टर और बैरिकेड लगाए गए हैं। हर आने वाले श्रद्धालु की जांच की जा रही है। मंदिर परिसर में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात है, ताकि किसी भी तरह की अव्यवस्था या हुड़दंग को तुरंत रोका जा सके। मंदिर प्रशासन का कहना है कि यह व्यवस्था इसलिए की गई है, ताकि सभी श्रद्धालु शांति और श्रद्धा के साथ भगवान के दर्शन कर सकें।






