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मकर संक्रांति पर उज्जैन के महाकाल में उत्सव, तिल के उबटन से होगा बाबा महाकाल का विशेष स्नान

Written by:Bhawna Choubey
Published:
मकर संक्रांति और षटतिला एकादशी के दुर्लभ महासंयोग में उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में तिल उत्सव मनाया जाएगा। भस्म आरती में तिल से अभिषेक, तिल के पकवानों का भोग और शाम को महाकाल महालोक में महोत्सव का शुभारंभ होगा।
मकर संक्रांति पर उज्जैन के महाकाल में उत्सव, तिल के उबटन से होगा बाबा महाकाल का विशेष स्नान

मकर संक्रांति का पर्व सिर्फ ऋतु परिवर्तन का संकेत नहीं है बल्कि यह भारतीय संस्कृति, आस्था और परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ दिन है। इस वर्ष यह पर्व और भी खास हो गया है, क्योंकि 14 जनवरी को मकर संक्रांति के साथ षटतिला एकादशी, सर्वार्थसिद्धि योग और अमृतसिद्धि योग का दुर्लभ संयोग बन रहा है। ऐसे महासंयोग में उज्जैन के विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में विशेष धार्मिक आयोजन होंगे।

जैसे ही सूर्य उत्तरायण होता है, वैसे ही देशभर में दान-पुण्य, स्नान और पूजा का सिलसिला शुरू हो जाता है। उज्जैन में इस पावन अवसर पर भगवान महाकाल तिल के उबटन से स्नान करेंगे और तिल से बने पकवानों का महाभोग अर्पित किया जाएगा। यह दृश्य श्रद्धालुओं के लिए आस्था और भक्ति से भर देने वाला होगा।

मकर संक्रांति पर महाकाल में तिल उत्सव की परंपरा

मकर संक्रांति के दिन तड़के 4 बजे होने वाली भस्म आरती में महाकाल मंदिर में विशेष तिल उत्सव मनाया जाएगा। भगवान महाकाल को तिल के उबटन से स्नान कराया जाएगा। इसके बाद तिल से बने लड्डू, तिलकुट और अन्य पकवानों का महाभोग अर्पित कर आरती संपन्न होगी। तिल को हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना गया है। तिल को पाप नाशक, पुण्यदायक और आरोग्य प्रदान करने वाला कहा गया है। इसी कारण मकर संक्रांति और षटतिला एकादशी पर तिल का विशेष महत्व होता है। महाकाल मंदिर में होने वाला यह तिल उत्सव इसी आस्था का प्रतीक है।

सूर्य का मकर राशि में प्रवेश और पुण्य काल

दान और स्नान का शुभ समय

पंचांग के अनुसार 14 जनवरी को दोपहर 3 बजकर 8 मिनट पर सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करेंगे। इसी के साथ सूर्य उत्तरायण हो जाएंगे। सूर्य के उत्तरायण होते ही दान-पुण्य का विशेष काल शुरू हो जाता है। धर्मशास्त्रों में बताया गया है कि सूर्य के उत्तरायण होने के बाद किया गया स्नान, दान और जप कई गुना फल देता है। इस बार मकर संक्रांति का पुण्य काल 15 जनवरी को माना जा रहा है। लेकिन 14 जनवरी को षटतिला एकादशी होने के कारण इस दिन का धार्मिक महत्व और भी बढ़ गया है।

षटतिला एकादशी का विशेष महत्व

तिल से जुड़ा व्रत और पूजा

षटतिला एकादशी का नाम ही तिल से जुड़ा हुआ है। इस दिन तिल से स्नान, तिल का दान, तिल से हवन, तिल का सेवन और तिल से पूजा करने का विधान बताया गया है। मान्यता है कि इस दिन तिल से जुड़ा हर कार्य पापों का नाश करता है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है। इस बार षटतिला एकादशी और मकर संक्रांति एक ही दिन पड़ने से श्रद्धालुओं में खास उत्साह है। उज्जैन सहित प्रदेशभर के मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक आयोजन होंगे।

महाकाल महालोक में होगा महाकाल महोत्सव का शुभारंभ

मकर संक्रांति की शाम उज्जैन के श्री महाकाल महालोक में भव्य आयोजन होने जा रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के हाथों श्री महाकाल महोत्सव का शुभारंभ किया जाएगा। इस अवसर पर महालोक शिवोह्म के नाद से गूंज उठेगा। महाकाल महालोक पहले ही उज्जैन की धार्मिक और पर्यटन पहचान को नई ऊंचाई दे चुका है। मकर संक्रांति जैसे पावन पर्व पर यहां होने वाला आयोजन श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण रहेगा।

सांदीपनि आश्रम और कृष्ण मंदिरों में भी विशेष आयोजन

मकर संक्रांति और षटतिला एकादशी के अवसर पर उज्जैन के सांदीपनि आश्रम, गोपाल मंदिर और अन्य कृष्ण मंदिरों में भी विशेष उत्सव मनाए जाएंगे। भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षा स्थली सांदीपनि आश्रम में तिल मिश्रित जल से भगवान का अभिषेक किया जाएगा। इसके बाद तिल से बने पकवानों का महाभोग लगाकर आरती की जाएगी। हम देखते हैं कि उज्जैन में यह पर्व सिर्फ एक मंदिर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे शहर में धार्मिक उल्लास फैल जाता है।

खिचड़ी दान और सेवन को लेकर भ्रम

मकर संक्रांति पर खिचड़ी का दान और सेवन आम परंपरा मानी जाती है। लेकिन इस बार षटतिला एकादशी के संयोग के कारण श्रद्धालुओं में भ्रम की स्थिति बनी हुई है। एकादशी के दिन अन्न, विशेषकर चावल का सेवन वर्जित माना जाता है। विद्वानों का कहना है कि मकर संक्रांति के दिन चावल या खिचड़ी का दान करने में कोई बाधा नहीं है। हालांकि, एकादशी होने के कारण इसके सेवन से बचना चाहिए। दिनभर फलाहार करने के बाद अगले दिन पारणा करना उचित माना गया है।

तिल का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

हम अगर तिल के महत्व को समझें, तो यह सिर्फ एक खाद्य पदार्थ नहीं है। तिल को यमराज से जुड़ा हुआ माना गया है और पितृ दोष शांति के लिए भी इसका प्रयोग किया जाता है। मकर संक्रांति पर तिल का दान करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है, ऐसा शास्त्रों में बताया गया है। इसी कारण इस दिन तिल के लड्डू, तिलकुट और तिल से बनी मिठाइयों का विशेष महत्व होता है। महाकाल मंदिर में तिल के उबटन से स्नान और तिल के भोग की परंपरा इसी आस्था को दर्शाती है।

 

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Bhawna Choubey
लेखक के बारे में
मुझे लगता है कि कलम में बहुत ताकत होती है और खबरें हमेशा सच सामने लाती हैं। इसी सच्चाई को सीखने और समझने के लिए मैं रोज़ाना पत्रकारिता के नए पहलुओं को सीखती हूँ। View all posts by Bhawna Choubey
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