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अलीगढ़ को हरिगढ़ बनाने में अब देर नही; केशव प्रसाद मौर्य के बयान से मुद्दा फिर से गरमाया

Written by:Saurabh Singh
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अलीगढ़ का नाम इसके इतिहास में पांच बार बदला जा चुका है। पहले इसे कॉल के नाम से जाना जाता था, फिर सब्जाबाद, मोहम्मदगढ़, सरकार और सबीतगढ़ नाम रखे गए। 1775 में गवर्नर नजफ अली खान के नाम पर इसका नाम अलीगढ़ रखा गया, जो तब से प्रचलित है।
अलीगढ़ को हरिगढ़ बनाने में अब देर नही; केशव प्रसाद मौर्य के बयान से मुद्दा फिर से गरमाया

उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने अलीगढ़ का नाम बदलकर हरिगढ़ करने का मुद्दा एक बार फिर से गरमा दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की पुण्यतिथि पर आयोजित एक कार्यक्रम में मौर्य ने कहा कि फैजाबाद का नाम अयोध्या, इलाहाबाद का नाम प्रयागराज कर दिया गया है, और हाल ही में जलालाबाद का नाम परशुरामपुरी किया गया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि अब अलीगढ़ का नाम हरिगढ़ करने में देर नहीं होनी चाहिए। उनके इस बयान पर उपस्थित लोगों ने नारेबाजी शुरू कर दी, जिससे यह मुद्दा फिर से चर्चा में आ गया।

पिछले कुछ वर्षों में अलीगढ़ का नाम बदलने की मांग कई बार उठ चुकी है। इस साल बीजेपी के जिला पंचायत अध्यक्ष विजय सिंह जादौन ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लखनऊ में मुलाकात कर इस मांग को दोहराया। जादौन ने बताया कि 2021 में अलीगढ़ के सभी विधायकों और सांसद ने हरिगढ़ नामकरण का प्रस्ताव शासन को भेजा था। मुख्यमंत्री ने इस संबंध में उन्हें आश्वासन दिया है। इस मांग को बीजेपी के कई नेता समर्थन दे रहे हैं, जिससे यह मुद्दा सियासी रंग ले रहा है।

अलीगढ़ का नाम पहले भी पांच बार बदला गया

इतिहासकारों के अनुसार, अलीगढ़ का नाम इसके इतिहास में पांच बार बदला जा चुका है। पहले इसे कॉल के नाम से जाना जाता था, फिर सब्जाबाद, मोहम्मदगढ़, सरकार और सबीतगढ़ नाम रखे गए। 1775 में गवर्नर नजफ अली खान के नाम पर इसका नाम अलीगढ़ रखा गया, जो तब से प्रचलित है। इस बार हरिगढ़ नामकरण की मांग को लेकर बीजेपी नेताओं का तर्क है कि यह नाम क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को और मजबूत करेगा।

इतिहासकार इरफान हबीब ने जताई आपत्ति

प्रसिद्ध इतिहासकार इरफान हबीब ने अलीगढ़ का नाम हरिगढ़ करने की मांग का विरोध करते हुए कहा कि इतिहास में इस क्षेत्र का नाम कभी भी हरिगढ़ नहीं रहा। उन्होंने दावा किया कि इस नाम का कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है और इस तरह की मांग गलत दावों पर आधारित है। उनके इस बयान ने नामकरण विवाद को और जटिल कर दिया है, जिससे इस मुद्दे पर सियासी और सामाजिक बहस तेज होने की संभावना है।