उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों की बिसात अभी से बिछने लगी है और राजनीतिक दलों के बीच बयानों के तीर चलने शुरू हो गए हैं। ताजा मामला समाजवादी पार्टी द्वारा बहुजन नायक कांशीराम की जयंती को ‘PDA दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा से जुड़ा है, जिस पर बसपा सुप्रीमो मायावती ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इसे सपा की ‘विशुद्ध राजनीतिक नाटकबाजी’ करार दिया, जिसके बाद सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भी बिना नाम लिए पलटवार किया है।
समाजवादी पार्टी ने हाल ही में ऐलान किया कि वह इस वर्ष से कांशीराम की जयंती को ‘PDA दिवस’ के तौर पर मनाएगी। पार्टी की योजना हर जिले में कार्यक्रम आयोजित कर पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक (PDA) वर्ग को एकजुट करने की है। सपा का तर्क है कि यह पहल सामाजिक न्याय की राजनीति को आगे बढ़ाने का एक कदम है।
मायावती का हमला: ‘यह सिर्फ नाटकबाजी’
सपा के इस फैसले पर बसपा प्रमुख मायावती ने कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने सपा के इस कदम को दलितों और पिछड़ों के वोट हासिल करने की एक चाल बताया। अपने बयान में उन्होंने 1993 के सपा-बसपा गठबंधन और 2 जून 1995 के लखनऊ गेस्ट हाउस कांड का जिक्र करते हुए समाजवादी पार्टी पर दलित विरोधी होने का पुराना आरोप दोहराया।
मायावती ने सवाल उठाया, “जब कांशीराम जीवित थे, तब सपा ने उन्हें सम्मान क्यों नहीं दिया? उनके निधन पर राजकीय शोक तक घोषित नहीं किया गया था।” उन्होंने बहुजन समाज के लोगों से सपा के पुराने रवैये को न भूलने की अपील की।
अखिलेश यादव का सधा हुआ पलटवार
मायावती के आरोपों के बाद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सीधे तौर पर उनका नाम लिए बिना जवाब दिया। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी हमेशा बड़ों का सम्मान करती है और रिश्तों को मन से निभाती है। अखिलेश ने एक तरह से यह भी संकेत दिया कि हो सकता है यह बयान मायावती का अपना न हो।
“हम जिन बड़ों का सम्मान करते हैं, उनसे सहानुभूति भी रखते हैं। हम अपने बड़ों और संबंधों को हमेशा मन से निभाते हैं। जरूरी नहीं कि जो लिखा जाए, वही भावना हो। कई बार लिखने वाले और लिखवाने वाले अलग होते हैं।” — अखिलेश यादव, सपा प्रमुख
अखिलेश यादव ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ ताकतें समाज को बांटकर सत्ता में बने रहना चाहती हैं।
क्या है सपा का ‘पीडीए दिवस’ का मकसद?
समाजवादी पार्टी के अनुसार, ‘पीडीए दिवस’ उन सभी महापुरुषों को समर्पित है जिन्होंने समाज के हर पीड़ित, दुखी और अपमानित व्यक्ति के मान-सम्मान और बराबरी के लिए संघर्ष किया। अखिलेश यादव ने अपने ‘PDA’ नारे को दोहराते हुए कहा, ‘जो पीड़ित है, वही PDA है।’ इस पहल को 2027 चुनावों से पहले सपा की दलित और पिछड़े वोटों पर अपनी पकड़ मजबूत करने की एक बड़ी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।






