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उत्तराखंड में सियासी हलचल: नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य और प्रीतम सिंह का इस्तीफा

Written by:Vijay Choudhary
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उत्तराखंड में सियासी हलचल: नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य और प्रीतम सिंह का इस्तीफा

उत्तराखंड की राजनीति में बुधवार को एक बड़ा मोड़ आया, जब नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य और वरिष्ठ कांग्रेस नेता प्रीतम सिंह ने विधानसभा की कार्यमंत्रणा समिति से इस्तीफा दे दिया। ये कदम सरकार के उस रवैये के विरोध में उठाया गया, जिसमें विपक्ष की आवाज को दबाया जा रहा था। विपक्ष का कहना है कि राज्य में कानून-व्यवस्था, आपदा और पंचायत चुनावों में धांधली जैसे गंभीर मुद्दों पर चर्चा नहीं होने दी गई।

विपक्ष का आरोप: विधानसभा को मनमर्जी से चला रही सरकार

नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर कहा कि सरकार विधानसभा को बिना बैठक के ही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह लोकतंत्र और सदन की मर्यादा के खिलाफ है।

विपक्ष का कहना है कि जब सदन में गंभीर मुद्दों पर चर्चा की मांग की जाती है, तो उसे नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। इससे उनकी भूमिका को कमजोर किया जा रहा है और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को नुकसान पहुंच रहा है।

आपदा राहत पर सरकार का ध्यान नहीं: आर्य

पत्र में यशपाल आर्य ने साफ तौर पर लिखा कि जब उत्तरकाशी के धराली और अन्य क्षेत्रों में भारी बारिश और आपदा से जन-धन की हानि हो रही थी, तब सरकार का ध्यान राहत कार्यों पर नहीं, बल्कि पंचायत पदों पर कब्जा करने की रणनीति पर था।

उन्होंने कहा कि सरकार को आपदा की गंभीरता को देखते हुए विशेष ध्यान देना चाहिए था, लेकिन सत्ता पक्ष राजनीति में ही व्यस्त रहा।

पंचायत चुनावों में गुंडागर्दी और प्रशासन की भूमिका पर सवाल

प्रीतम सिंह और यशपाल आर्य दोनों ने पंचायत चुनावों को लेकर भी सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उनका कहना है कि इन चुनावों में गुंडागर्दी, प्रशासन की मिलीभगत और विपक्षी प्रतिनिधियों को डराने-धमकाने की घटनाएं सामने आईं।

विपक्ष का दावा है कि कई जिलों में पंचायत प्रतिनिधियों को अगवा किया गया और बीजेपी समर्थित लोगों को जबरन चुनाव जिताया गया। इस मुद्दे पर चर्चा कराने की उनकी मांग सरकार ने बार-बार अनसुनी कर दी।

इस्तीफा केवल नाराज़गी नहीं, लोकतंत्र की पुकार

नेता प्रतिपक्ष और वरिष्ठ नेताओं का कार्यमंत्रणा समिति से इस्तीफा देना केवल राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि लोकतंत्र के मौलिक सिद्धांतों के लिए एक मजबूत संदेश है। विपक्ष का कहना है कि अगर सरकार सुनवाई नहीं करेगी, तो वे सदन में बैठकर चुप नहीं रह सकते।

अब सभी की निगाहें विधानसभा अध्यक्ष और राज्य सरकार पर हैं कि वे विपक्ष की इन गंभीर शिकायतों का क्या जवाब देती हैं और आगे का रुख क्या होगा।