उत्तराखंड में आज भी है ये ‘अजीबोगरीब’ नियम, इन लोगों को वोट देने की इजाजत नहीं, जानें…

उत्तराखंड के लाखों वन ग्रामीण पंचायत चुनाव में भाग नहीं ले सकते क्योंकि वे वन विभाग की जमीन पर बसे हैं। उन्हें राजस्व गांव का दर्जा नहीं मिला है। सरकारें केवल वादे करती हैं, लेकिन समस्या अब भी जस की तस बनी हुई है।
उत्तराखंड में आज भी है ये ‘अजीबोगरीब’ नियम, इन लोगों को वोट देने की इजाजत नहीं, जानें…

उत्तराखंड के हजारों ग्रामीणों का हर पंचायत चुनाव में वही पुराना दर्द ताजा हो जाता है – अपने गांव के विकास के लिए वे न तो वोट कर सकते हैं और न ही चुनाव में भाग ले सकते हैं। इन ग्रामीणों को वन ग्रामीण कहा जाता है, जो वन विभाग की भूमि पर बसे हुए हैं। राज्य में इनकी संख्या लाखों में है। ये विधानसभा और लोकसभा चुनाव में मतदान करते हैं, लेकिन ग्राम पंचायत चुनाव में इनका कोई अधिकार नहीं है। इसका मुख्य कारण यह है कि ये गांव कानूनी रूप से वन भूमि पर हैं और इन्हें राजस्व गांव का दर्जा नहीं मिला है।

ना बिजली-पानी, ना पक्के मकान – विकास से कोसों दूर वन ग्राम

वन ग्रामों की स्थिति बदहाल है। यहां न तो बिजली-पानी की सुविधा है, न ही पक्के मकान बनाने की अनुमति। ग्रामीण केवल टीन या घास-फूस की झोपड़ियों में जीवन यापन करने को मजबूर हैं। ना सड़क है, ना अस्पताल और स्कूल। यहां विकास कार्य भी नहीं होते क्योंकि पंचायतों की भूमिका ही यहां शून्य है। ग्रामीण वर्षों से अपने अधिकारों की मांग कर रहे हैं, लेकिन सरकारें वादे करके भूल जाती हैं।

मनोनित ग्राम प्रधानों की पीड़ा

रामनगर के सुंदरखाल गांव के मनोनित ग्राम प्रधान चंदन राम का कहना है कि वे चाहते हैं सरकार उन्हें या तो विस्थापित कर राजस्व भूमि पर बसाए या उनके गांव को ही राजस्व ग्राम घोषित करे। उन्होंने बताया कि यहां ग्राम प्रधान चुनाव नहीं होता, बल्कि गांव के लोग मिलकर एक मुखिया मनोनीत करते हैं, जो सरकार से सुविधाओं की मांग करता है – लेकिन उसके पास कोई कानूनी अधिकार नहीं होता।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएं – एक-दूसरे पर आरोप

पूर्व कांग्रेस विधायक रंजीत सिंह रावत ने कहा कि जब उनकी सरकार थी तो वन ग्रामों को राजस्व ग्राम में बदलने का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया था। अब केंद्र और राज्य – दोनों में बीजेपी की सरकार है, तो अब यह जिम्मेदारी उनकी बनती है। दूसरी ओर, बीजेपी प्रवक्ता सुरेश जोशी ने कांग्रेस पर पलटवार करते हुए कहा कि 1980 में इंदिरा गांधी ने जो फॉरेस्ट एक्ट में संशोधन किया, वह आज की समस्याओं की जड़ है। उन्होंने स्वीकार किया कि एक देश में दो नियम नहीं हो सकते – अगर विधानसभा व लोकसभा में वोट का अधिकार है, तो ग्राम सभा में क्यों नहीं?

कानून की जटिलताएं बनीं रोड़ा

बीजेपी नेता ने माना कि फॉरेस्ट एक्ट में कई प्रावधान इतने जटिल हैं कि बदलाव के लिए लोकसभा में संशोधन जरूरी होता है, जिसमें समय लगता है। उन्होंने कहा कि राज्य और केंद्र सरकार मिलकर वन ग्रामीणों की स्थिति सुधारने पर काम कर रही हैं, लेकिन तकनीकी और कानूनी अड़चनें आ रही हैं, जिन्हें दूर करना आसान नहीं है।

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