‘रे बचपन तुझे अब में अपने बच्चों में खोजता हूँ, किधर गया वो भोलापन अब ये सोचता हूँ’

‘रे बचपन तुझे अब में अपने बच्चों में खोजता हूँ, किधर गया वो भोलापन अब ये सोचता हूँ’

लेखक: रितेश शर्मा (Pwd विद्युत यांत्रिकी में प्रभारी सहायक)

…..बचपन का स्कूल
कंधे पे बस्ता ओर हाथ मे पानी की बोतल,पेन्सिल के लिए लड़ना ओर आगे बेठने के लिये झगड़ना, वो दोस्त बनाना ओर किसी बात पे कुट्टी हो जाना..रेसिस के इंतज़ार मे क्लास से बाहर ताकते रहना..खेल का मैदान ओर धूल मे सने पेर. वो स्कूल के गेट पे ईमली ओर चने खरीदना, ओर फिर नज़र बचा के स्कूल से भाग कर जाना. कभी पकड़े गये तो मारे डर के कापना .हॉमवर्क ना करके आने की सज़ा..ओर दोस्तो से हर रोज़ मिलने का मज़ा यही थी जिंदगानी….वो बचपन ओर उसकी कहानी………वो कागज की कश्ती और बारिश का पानी….सब भुलाए नही भूलता..
………फिर वही सुबह ओर कंधे पे झूलते बस्ते स्कूल की पगडंडियाँ बस सबकुछ वही है द्रश्यम के पात्र बदल गए है पहले हमें कोई छोड़ा करता था हाथ पकड़ के ओर अब हम छोड़ते है अपने बच्चों को l सब कुछ चलता रहता है बस पात्र ओर किरदार बदल जाते है शेक्सपियर्स की वो सशक्त पंक्तिया “यहाँ हम सब रंग मंच की कठपुतली है ओर उसकी डोर ऊपर वाले के हाथो में है ” कठपुतलिवाला ओर डोर नहि बदलती बदले है तो कठपुतली के पात्र बदले है l
सुनहरी यादों के इस पन्ने को आप भो पढ़े याद करे अपना बचपन ओर बचपन की वो सुबह , कुछ अनमनि सी कुछ कुनमूनी सी अलसाईं सी भोर सुनहरी , जल्दी से मुँह धोकर तैयार होना कई तो आज भी अर्ध स्नान करके बालों में पानी के छींटे ओर कंघी फ़ी के राजा बाबु बन निकल लेते थे माँ अवाज लगा रही है बेटा टिफ़िन तो लेना भूल गए ये तो लेजा” उस वक़्त एक ओर चीज़ थी जो शायद अबकि पीढ़ी को ना मिल पाए वो है ताँगा ….. उफ़्फ़्फ क्या मज़ा था उसकी सवारी का लौट के तो ताँगे वाले को मना कर लगाम अपने हाथो में लेके ख़ुद भी हाथ साफ़ कर लेते थे ” अब उनकी जगह लोहे की वैन ऑटो ओर बसो ने ले ली है वरना आज जेसे बसो की लाइन लगती है ताँगे ओर घोड़ों की हिनहिनाहटे सुनाई देती थी वो शोर आज के धुआँ उगलती लोहे से अच्छा था , रेस लगती थी अपना घोड़ा आगे निकल जाए तो जीत की ख़ुशी यो मानो अलिम्पिक में जीत लिए हो फिर हारने वाला कल की चुनौती दे कर घर वापिस ऐंगल दिन फिर हार जीत का खेल चालू पर मज़ा था उसने ” जो आज नही l
स्कूल ज़िन्दगी का महत्वपूर्ण पड़ाव है l तो बस याद करो ओर यादों में खो जाओं l

Gaurav Sharma
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निदेशक और संपादक

पत्रकारिता पेशा नहीं ज़िम्मेदारी है और जब बात ज़िम्मेदारी की होती है तब ईमानदारी और जवाबदारी से दूरी बनाना असंभव हो जाता है। एक पत्रकार की जवाबदारी समाज के लिए उतनी ही आवश्यक होती है जितनी परिवार के लिए क्यूंकि समाज का हर वर्ग हर शख्स पत्रकार पर आंख बंद कर उस तरह ही भरोसा करता है जितना एक परिवार का सदस्य करता है। पत्रकारिता मनुष्य को समाज के हर परिवेश हर घटनाक्रम से अवगत कराती है, यह इतनी व्यापक है कि जीवन का कोई भी पक्ष इससे अछूता नहीं है। यह समाज की विकृतियों का पर्दाफाश कर उन्हे नष्ट करने में हर वर्ग की मदद करती है। इसलिए पं. कमलापति त्रिपाठी ने लिखा है कि," ज्ञान और विज्ञान, दर्शन और साहित्य, कला और कारीगरी, राजनीति और अर्थनीति, समाजशास्त्र और इतिहास, संघर्ष तथा क्रांति, उत्थान और पतन, निर्माण और विनाश, प्रगति और दुर्गति के छोटे-बड़े प्रवाहों को प्रतिबिंबित करने में पत्रकारिता के समान दूसरा कौन सफल हो सकता है। View all posts by Gaurav Sharma →
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