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मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति पर कमलनाथ ने उठाए सवाल, कहा ‘पूर्व सरकारी वकीलों से निष्पक्षता की उम्मीद कैसे करें’

Written by:Shruty Kushwaha
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उन्होंने कहा कि जब अदालत में बैठा जज कभी उसी सत्ता का पैरोकार रहा हो, जिसके खिलाफ आज नागरिक न्याय की गुहार लगा रहा है तो आम आदमी के मन में यह शंका पैदा होना स्वाभाविक है कि क्या उसे सच में बिना पक्षपात के न्याय मिल पाएगा।
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति पर कमलनाथ ने उठाए सवाल, कहा ‘पूर्व सरकारी वकीलों से निष्पक्षता की उम्मीद कैसे करें’

Kamal Nath

कमलनाथ ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में जजों की नियुक्तियों को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा है कि लोकतंत्र में न्यायपालिका आखिरी उम्मीद की संस्था है, लेकिन जब अदालतों में पूर्व सरकारी वकीलों की बड़ी संख्या नियुक्त होती दिखती है तो निष्पक्षता पर संदेह पैदा होता है।

उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट में हालिया नियुक्त जजों का एक बड़ा हिस्सा पहले राज्य सरकार के वकील के रूप में काम कर चुका है। उन्होंने कहा कि यह संयोग नहीं बल्कि ऐसी स्थिति है जो न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सीधा प्रश्नचिह्न लगाती है। पूर्व सीएम ने कहा कि वर्षों तक सरकार का पक्ष रखने के बाद उसी सरकार से जुड़े मामलों में पूर्ण निष्पक्षता की अपेक्षा करना स्वाभाविक रूप से संदेह को जन्म देता है।

कमलनाथ ने हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति पर उठाए सवाल

कमलनाथ ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्तियों को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने न्यायपालिका की संरचना और उसकी निष्पक्षता को लेकर गंभीर चिंता जताई और कहा कि लोकतंत्र में न्यायपालिका वह अंतिम संस्था मानी जाती है जहां सत्ता के अत्याचार के खिलाफ आम नागरिक की आखिरी उम्मीद टिकी होती है। जनता का यह विश्वास होता है कि अदालतें किसी भी प्रकार के दबाव से मुक्त रहकर सिर्फ संविधान और न्याय के आधार पर फैसले देंगी। लेकिन वर्षों तक सरकार का पक्ष रखने, उसकी नीतियों और निर्णयों का बचाव करने के बाद अचानक उसी सरकार के मामलों में निष्पक्ष निर्णय देने की अपेक्षा करना स्वाभाविक रूप से संदेह को जन्म देता है।

कहा ‘व्यक्तिगत ईमानदारी या योग्यता पर हमला नहीं’

पूर्व मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि यह टिप्पणी किसी जज की व्यक्तिगत ईमानदारी या योग्यता पर हमला नहीं है, बल्कि पूरी नियुक्ति प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल है। कमलनाथ ने कहा कि “न्याय का सिर्फ होना ही पर्याप्त नहीं है, उसका निष्पक्ष दिखना भी उतना ही आवश्यक है।” जब अदालत में बैठा व्यक्ति कभी उसी सत्ता का पैरोकार रहा हो, जिसके विरुद्ध आज नागरिक न्याय की गुहार लगा रहा है तो आम आदमी के मन में शंका उत्पन्न होना स्वाभाविक है।

‘क्या न्यायपालिका जनता की उम्मीदों की संरक्षक बनी रहेगी’

उन्होंने न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता, संतुलन और विविध पृष्ठभूमियों के प्रतिनिधित्व पर ज़ोर देते हुए कहा कि अदालतें किसी एक ही वर्ग या सत्ता-समर्थक पृष्ठभूमि तक सीमित नहीं होनी चाहिए। यदि समय रहते इस प्रवृत्ति पर आत्ममंथन और सुधार नहीं किया गया तो भले ही अदालतों के फैसले तकनीकी रूप से वैध हों, लेकिन जनता की नज़र में उनकी विश्वसनीयता लगातार कम होती चली जाएगी। कमलनाथ ने सवाल उठाया कि क्या न्यायपालिका जनता की उम्मीदों की संरक्षक बनी रहेगी या सत्ता के साये में खड़ी एक और संस्था बनकर रह जाएगी। उन्होंने कहा कि इस प्रश्न का उत्तर आने वाले समय में भारतीय लोकतंत्र की दिशा तय करेगा।