बाल संप्रेक्षण गृह से फिर भागे 6 बाल अपचारी, बाथरूम की दीवार तोड़कर रात के अँधेरे में फरार, सुरक्षा पर सवाल

घटना के बाद जांच शुरू होती है, लेकिन सुरक्षा में सुधार के लिए स्थायी कदम नहीं उठाया गया। लगातार हो रही इन घटनाओं से यह स्पष्ट है कि विभाग बालकों की सुरक्षा और पुनर्वास के दायित्व में बुरी तरह विफल साबित हो रहा है।
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खंडवा बाल संप्रेक्षण गृह से एक बार फिर छह बाल अपचारी फरार हो गए हैं। यह घटना विभाग की सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक लापरवाही का गंभीर उदाहरण बनकर सामने आई है। बीते कुछ महीनों में इस तरह की घटनाएँ बार-बार हो रही हैं, जिससे विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

सूत्रों के अनुसार ये बाल अपचारी चोरी, अपहरण, लूट के अलावा कुछ बालक बालिकाओं से छेड़छाड़ और POCSO जैसी गंभीर धाराओं में भी आरोपित हैं। ये सभी बालक बाथरूम की दीवार तोड़कर फरार हुए। घटना रात में हुई, जबकि कर्मचारियों को इसकी जानकारी सुबह प्राप्त हुई।

तीन माह पूर्व भी भागे थे पाँच बालक

करीब तीन माह पहले भी संप्रेक्षण गृह से पाँच बच्चे भाग गए थे, जिनमें से केवल तीन ही बरामद किए जा सके थे, जबकि दो अब तक लापता हैं। हालिया घटना में फरार हुए छह बालकों में पाँच खरगोन जिले के और एक बुरहानपुर क्षेत्र का है।

सुरक्षा में लगातार चूक, दीवार बन रही भागने का रास्ता

हर बार बच्चों के भागने का तरीका लगभग समान है जैसे बाथरूम की दीवार या खिड़की तोड़कर भाग निकलना। इससे स्पष्ट है कि विभाग ने पहले की घटनाओं से कोई सबक नहीं लिया और सुरक्षा इंतजाम केवल कागजों पर सीमित हैं।

प्रभारी की लापरवाही, नोटिस के बाद भी सुधार नहीं

घटना के बाद जब प्रभारी अजय गुप्ता से संपर्क किया गया, तो उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया। बताया जाता है कि उनके कार्यों में लगातार लापरवाही बरती जा रही है, जिस पर महिला एवं बाल विकास अधिकारी ने एक सप्ताह पूर्व ही नोटिस जारी कर जवाब तलब किया था।

कलेक्टर ने जताई थी नाराजगी, कार्रवाई अधूरी रही

सूत्रों के अनुसार, खंडवा कलेक्टर ऋषव गुप्ता ने पूर्व में बच्चों के भागने की घटनाओं पर बाल विकास अधिकारी को नोटिस जारी कर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए थे, लेकिन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा मामले में लीपा-पोती कर दी गई। कुछ कर्मचारियों का औपचारिक स्थानांतरण तो हुआ, मगर मुख्य जिम्मेदारों पर कोई ठोस दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई।

बालकों की असंतुष्टि भी बनी वजह

विभागीय सूत्रों के अनुसार, बालक संप्रेक्षण गृह की भोजन, पानी और रहने की व्यवस्था से असंतुष्ट हैं। कई बार बच्चों ने खाने की गुणवत्ता और सुविधाओं की कमी को लेकर शिकायत की, लेकिन उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया। यही कारण है कि बालक बार-बार भागने का प्रयास करते रहते हैं।

महिला एवं बाल विकास अधिकारी पर भी उठे सवाल

जानकारी के मुताबिक, महिला एवं बाल विकास अधिकारी, जो आगर-मालवा से स्थानांतरित होकर खंडवा जिला परियोजना अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं, वे भी कई विवादों में रही हैं। सूत्र बताते हैं कि वे विभागीय कार्यों को पर्याप्त समय नहीं देतीं और केवल टीएल बैठक या जनसुनवाई के दिन तक ही खंडवा में उपस्थित रहती हैं। इसके बाद वे “टूर” का हवाला देकर अनुपस्थित रहती हैं, जिससे विभागीय नियंत्रण कमजोर पड़ा है।

प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल

हर बार घटना के बाद जांच शुरू होती है, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था सुधारने के लिए कोई स्थायी कदम नहीं उठाया गया। लगातार हो रही इन घटनाओं से यह स्पष्ट है कि विभाग बालकों की सुरक्षा और पुनर्वास के दायित्व में बुरी तरह विफल साबित हो रहा है।

जरूरत सख्त और ठोस कार्रवाई की

विशेषज्ञों का कहना है कि अब समय आ गया है जब विभाग को केवल नोटिस या जांच तक सीमित न रहकर वास्तविक सुधारात्मक कदम उठाने होंगे। संप्रेक्षण गृह की सुरक्षा, भोजन और निगरानी व्यवस्था को दुरुस्त किए बिना बच्चों का सुरक्षित संरक्षण संभव नहीं है।

खंडवा से सुशील विधाणी की रिपोर्ट 

Atul Saxena
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पत्रकारिता में तीन दशक से अधिक का अनुभव.

पत्रकारिता मेरे लिए एक मिशन है, हालाँकि आज की पत्रकारिता ना ब्रह्माण्ड के पहले पत्रकार देवर्षि नारद वाली है और ना ही गणेश शंकर विद्यार्थी वाली, फिर भी मेरा ऐसा मानना है कि यदि खबर को सिर्फ खबर ही रहने दिया जाये तो ये ही सही अर्थों में पत्रकारिता है और मैं इसी मिशन पर पिछले तीन दशकों से ज्यादा समय से लगा हुआ हूँ.... पत्रकारिता के इस भौतिकवादी युग में मेरे जीवन में कई उतार चढ़ाव आये, बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ा लेकिन इसके बाद भी ना मैं डरा और ना ही अपने रास्ते से हटा ....पत्रकारिता मेरे जीवन का वो हिस्सा है जिसमें सच्ची और सही ख़बरें मेरी पहचान हैं .... View all posts by Atul Saxena →
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