Hindi News

हिमाचल में मलबा बना तबाही का कारण, डंपिंग साइटों की भारी कमी से बढ़ा संकट

Written by:Neha Sharma
Published:
हिमाचल प्रदेश में मलबे को ठिकाने लगाने की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। पंचायतों और शहरी निकायों के पास एक भी अधिकृत डंपिंग साइट नहीं है। बड़ी परियोजनाएं बना रही कंपनियां कागजों में डंपिंग साइटें जरूर दिखा रही हैं, लेकिन हकीकत में नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
हिमाचल में मलबा बना तबाही का कारण, डंपिंग साइटों की भारी कमी से बढ़ा संकट

हिमाचल प्रदेश में मलबे को ठिकाने लगाने की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। पंचायतों और शहरी निकायों के पास एक भी अधिकृत डंपिंग साइट नहीं है। बड़ी परियोजनाएं बना रही कंपनियां कागजों में डंपिंग साइटें जरूर दिखा रही हैं, लेकिन हकीकत में नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। हिमाचल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तक ऐसे कई मामले पहुंच चुके हैं। प्रदेश हाईकोर्ट की ओर से नियुक्त एमिकस क्यूरी की रिपोर्ट में भी खुलासा हुआ है कि मलबा अवैध रूप से नदी-नालों और खड्डों के किनारे फेंका जा रहा है, जिससे आपदा की आशंका बढ़ रही है। शिमला नगर निगम की बरियाल साइट फिलहाल प्रदेश की इकलौती अधिकृत डंपिंग साइट है, लेकिन यह भी केवल ठोस कचरे के लिए बनी है, न कि भवनों और सड़कों से निकलने वाले मलबे के लिए।

बिजली परियोजनाएं, फोरलेन, एनएच और सुरंगों के निर्माण के दौरान कंपनियां टनों मलबा निकाल रही हैं और उसे अवैज्ञानिक तरीके से डंप कर रही हैं। भारी बारिश में यही मलबा बाढ़ और भूस्खलन का कारण बन रहा है। नियमों के तहत हर निर्माण कार्य से पहले डंपिंग साइट तय करना अनिवार्य है, लेकिन बीते एक दशक से यह प्रावधान नजरअंदाज किया जा रहा है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने हाल ही में सुन्नी बांध बना रही एसजेवीएन पर 70 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। इसी तरह एनएच निर्माण में कोताही पर बिलासपुर में करीब 6.5 लाख और हमीरपुर में 25 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया। बावजूद इसके हालात जस के तस बने हुए हैं।

डंपिंग साइटों की भारी कमी से बढ़ा संकट

विशेषज्ञों का कहना है कि अवैध डंपिंग ने प्राकृतिक जल स्रोतों को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। एमिकस क्यूरी अधिवक्ता देवेन खन्ना की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश की 99 फीसदी बावड़ियों और प्राकृतिक जल स्रोतों का पानी खराब हो चुका है। 35 नदियों में सीवरेज और कचरा मिल रहा है। बांधों में भी मलबा जमा हो रहा है और 22 वर्षों से गाद नहीं निकाली गई है। इसका असर मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ जैसी स्थिति बनाकर सामने आ रहा है। जून में धर्मपुर-सरकाघाट सीमा पर पाड़च्छू में पुल निर्माण के दौरान डंप किए गए हजारों टन मलबे से खड्ड में झील बन गई थी, जिससे पूरा धर्मपुर खतरे में आ गया था। चंबा, सोलन और शिमला में भी अवैज्ञानिक कटिंग और मलबा डंपिंग से भू-स्खलन और बाढ़ जैसी घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। हाईकोर्ट ने शिमला-सोलन-परवाणू फोरलेन मामले में एनएचएआई को फटकार लगाते हुए सनवारा टोल प्लाजा बंद करने तक की चेतावनी दी है।

पर्यावरण वैज्ञानिक सुरेश चंद अत्री का कहना है कि पहाड़ काटने का वैज्ञानिक तरीका होना चाहिए और हर प्रोजेक्ट से पहले डंपिंग साइट का चयन अनिवार्य है। मनमाने ढंग से पहाड़ काटने और मलबा फेंकने से आपदाओं की संभावना बढ़ गई है। इस बीच शहरी विकास मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने कहा कि शहरी क्षेत्रों में डंपिंग साइटें बनाने के निर्देश दिए गए हैं और बेतरतीब मलबा फेंकने वालों पर कार्रवाई की जा रही है। नगर नियोजन मंत्री राजेश धर्माणी ने कहा कि छोटे प्रोजेक्टों से निकलने वाले मलबे के लिए भी डंपिंग साइटें तय करना जरूरी है और सरकार इस दिशा में ठोस कदम उठाएगी।

मध्य प्रदेश से जुड़ी विश्वसनीय और ताज़ा खबरें MP Breaking News in Hindi यहां आपको मिलती है MP News के साथ साथ लगातार अपडेट, राजनीति, अपराध, मौसम और स्थानीय घटनाओं की सटीक जानकारी। भरोसेमंद खबरों के लिए हमारे साथ जुड़े रहें और अपडेटेड रहें !
Neha Sharma
लेखक के बारे में
A Passionate Digital News writer with deep expertise. Doing Sharp analysis with engaging storytelling. View all posts by Neha Sharma
Follow Us :GoogleNews