
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने हिमुडा (हिमाचल अर्बन डिवेलपमेंट अथॉरिटी) के कर्मचारियों और पेंशनरों के पक्ष में एक अहम निर्णय सुनाया है। अदालत ने भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) की ओर से पेंशन और महंगाई भत्ते (डीए) रोके जाने को अवैध करार दिया। खंडपीठ ने एलआईसी को आदेश दिया है कि कर्मचारियों और उनके परिवारों को तुरंत पेंशन और भत्तों का भुगतान किया जाए। न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति सुशील कुकरेजा की खंडपीठ ने यह भी साफ कर दिया कि एलआईसी द्वारा अतिरिक्त राशि की मांग गैरकानूनी है और इसे खारिज किया जाता है।
हिमुडा ने वर्ष 2008 में अपने कर्मचारियों के लिए पेंशन योजना लागू करने को लेकर एलआईसी के साथ समझौता किया था। इस समझौते के तहत हिमुडा ने एलआईसी को 21 करोड़ रुपये से अधिक की राशि दी थी। इसके बाद एलआईसी ने सेवानिवृत्त कर्मचारियों को पेंशन देना शुरू कर दिया। लेकिन वर्ष 2015 में एलआईसी ने यह कहते हुए पेंशन और डीए का भुगतान रोक दिया कि फंड पर्याप्त नहीं है। इसके साथ ही, 2010 में जारी मास्टर पॉलिसी का हवाला देते हुए अतिरिक्त फंड की मांग भी की गई।
हिमाचल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
हिमुडा और उसके कर्मचारियों ने एलआईसी के इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि 2008 का अनुबंध पहले ही पूरा हो चुका था और एलआईसी मास्टर पॉलिसी के नाम पर बाद में मनमानी ढंग से नए नियम नहीं थोप सकती। पेंशनरों ने इसे अनुबंध के उल्लंघन के साथ-साथ अपने अधिकारों का हनन बताया। इस मामले में अलग-अलग अपील याचिकाएं खंडपीठ के समक्ष आईं, जिन पर सुनवाई के बाद अदालत ने एक ही फैसला सुनाया।
अदालत ने सभी अपीलों को निपटाते हुए स्पष्ट किया कि एलआईसी की अतिरिक्त राशि की मांग का कोई आधार नहीं है और यह पेंशन योजना की मूल शर्तों के खिलाफ है। हाईकोर्ट ने एकल न्यायाधीश के फैसले को सही ठहराया और कहा कि पेंशन और भत्तों का भुगतान तुरंत शुरू किया जाए। इस फैसले के बाद हिमुडा के कर्मचारियों और पेंशनरों को बड़ी राहत मिली है, जो लंबे समय से अपने हक के लिए लड़ाई लड़ रहे थे।
