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8 साल बाद ब्रिटिश PM चीन में: हुआवे बैन और ट्रंप की नीतियों के बीच कीर स्टार्मर बीजिंग पहुंचे, रिश्ते सुधारने पर जोर

Written by:Banshika Sharma
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ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर आठ साल के लंबे अंतराल के बाद चीन के तीन दिवसीय दौरे पर हैं। यह यात्रा ऐसे समय हो रही है जब ब्रिटेन, अमेरिका के साथ अपने संबंधों को बनाए रखते हुए चीन के साथ बिगड़े हुए व्यापारिक और कूटनीतिक रिश्तों को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश कर रहा है।
8 साल बाद ब्रिटिश PM चीन में: हुआवे बैन और ट्रंप की नीतियों के बीच कीर स्टार्मर बीजिंग पहुंचे, रिश्ते सुधारने पर जोर

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर बुधवार को चीन के तीन दिवसीय दौरे पर बीजिंग पहुंचे। 2018 में तत्कालीन प्रधानमंत्री थेरेसा मे के बाद किसी ब्रिटिश पीएम का यह पहला चीन दौरा है। पिछले आठ सालों में वैश्विक राजनीति में बड़े बदलाव आए हैं और यह यात्रा ब्रिटेन की चीन नीति में एक महत्वपूर्ण संतुलन साधने की कोशिश के तौर पर देखी जा रही है।

यह दौरा इस बात का संकेत है कि ब्रिटेन अब चीन को न तो ‘सुनहरे दौर’ के दोस्त के रूप में देख रहा है और न ही एक दुश्मन के रूप में, बल्कि एक ऐसी हकीकत मान रहा है, जिसका सामना करना जरूरी है। स्टार्मर के साथ ब्रिटिश कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारी भी गए हैं, जिससे साफ है कि इस दौरे का एक बड़ा मकसद व्यापार और निवेश को बढ़ावा देना है।

‘गोल्डन एरा’ से हुआवे बैन तक

एक दशक पहले ब्रिटेन और चीन के रिश्ते ‘गोल्डन एरा’ यानी सुनहरे दौर में थे। 2015 में जब चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ब्रिटेन आए, तो तत्कालीन पीएम डेविड कैमरन उन्हें एक पब में बीयर पिलाने ले गए थे। लक्ष्य लंदन को चीनी निवेश का केंद्र बनाना था।

लेकिन इसके बाद हालात तेजी से बदले। हॉन्गकॉन्ग में चीन की कार्रवाई, ब्रेग्जिट और फिर 2020 में सुरक्षा चिंताओं को लेकर ब्रिटेन का चीनी टेक कंपनी हुआवे को अपने 5G नेटवर्क से प्रतिबंधित करने का फैसला, इन घटनाओं ने दोनों देशों के रिश्तों में कड़वाहट घोल दी। ब्रिटिश संसद की एक जांच में हुआवे और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के बीच मिलीभगत के सबूत मिलने की बात कही गई थी।

अब क्यों बदल रहा है ब्रिटेन का रुख?

विशेषज्ञों का मानना है कि इस बदलाव के पीछे कई वैश्विक कारण हैं। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की आक्रामक नीतियों ने यूरोपीय देशों को नए सहयोगी तलाशने पर मजबूर किया है। चीन इस लिहाज से एक मजबूत विकल्प नजर आता है। खुद स्टार्मर ने चीन रवाना होने से पहले कहा था कि ब्रिटेन को अमेरिका और चीन में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं है।

“अमेरिका के साथ रिश्ते बने रहेंगे, लेकिन चीन को नजरअंदाज करना सही नहीं होगा।” — कीर स्टार्मर, ब्रिटिश प्रधानमंत्री

चीन के विदेश मंत्रालय ने भी इस यात्रा का स्वागत करते हुए कहा है कि इससे दोनों देशों के बीच भरोसा बढ़ेगा और रिश्तों में स्थिरता आएगी। यह यात्रा ऐसे समय हो रही है जब फिनलैंड और आयरलैंड के प्रधानमंत्री भी हाल ही में चीन का दौरा कर चुके हैं।

दौरे का मुख्य एजेंडा

कीर स्टार्मर की इस यात्रा का मकसद चीन के प्रति बने शक और डर को कम करना है। इसके मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं:

  • रिश्ते सुधारना: पिछले कुछ सालों में बिगड़े संबंधों को फिर से संतुलित करना।
  • व्यापार बढ़ाना: ब्रिटिश कंपनियों के लिए चीन में नए अवसर तलाशना।
  • व्यावहारिक नीति: टकराव या अत्यधिक नजदीकी के बजाय एक संतुलित नीति अपनाना।
  • वैश्विक मुद्दों पर संवाद: जलवायु परिवर्तन और वैश्विक स्थिरता जैसे मुद्दों पर बातचीत करना।

हालांकि, इस यात्रा की आलोचना भी हो रही है। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि ब्रिटेन को शिनजियांग और हॉन्गकॉन्ग में मानवाधिकारों के उल्लंघन के मुद्दे को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। उम्मीद है कि स्टार्मर अपनी बातचीत में इन मुद्दों को भी उठाएंगे।