मजदूर दिवस: लॉकडाउन ने छीनी मजदूरी, रोजी-रोटी पर संकट

मजदूर दिवस: लॉकडाउन ने छीनी मजदूरी, रोजी-रोटी पर संकट

जबलपुर| संदीप कुमार| आज 1 मई- मजदूर दिवस (Labour Day)…जी हाँ आज के दिन को देश भर में मजदूर दिवस के रूप में याद किया जाता है| इस मजदूर दिवस में कोरोना वायरस संक्रमण ने लॉकडाउन (Lockdown) में मजदूरों को घर पर ही लॉक कर दिया है। एक माह से लॉकडाउन में फसे मजदूरों के पास मजदूरी नही है|

कोरोना वायरस (Corona VIrus) संक्रमण ने पूरे देश मे अगर सबसे ज्यादा किसी को प्रभावित किया है तो वो है मजदूर| आज कर्फ्यू के कारण मजदूरों के घर पर फाका पड़ा हुआ है। बर्तन तो है पर उस पर पकाने को भोजन नही है इतना ही नही मजदूरों को प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत गैस चूल्हा तो मिला पर आज उस चूल्हा में पकाने को कुछ भी नही है।

गरीब मजदूरों ने सरकार से लगाई गुहार…..….
जबलपुर (Jabalpur) में लॉक डाउन लगे हुए एक माह से भी ज्यादा का समय बीत गया है। पर हालात अभी भी ऐसे नही है कि लॉक डाउन खुले।जाहिर है ऐसी स्थिति में अपने फाके के दिनो को मजदूर आगे भी इस तरह से देखेंगे। लॉक डाउन से ये मजदूर हार गए है लिहाजा सरकार से मांग की है कि जल्द ये लॉक डाउन खुले जिससे कि मजदूर मजदूरी पर जा सके|.

अब समाजसेवियों ने भी बनाई मजदूरों से दूरी…….
लॉक डाउन के बाद लगातार गरीबो को भोजन बांटने वाली कुछ समाजसेवी संस्था जरूर मजदूरों के घरों में जाकर भोजन की व्यवस्था कर रही है | पर समय के साथ साथ अब सामजसेवीयो की संख्या और उनके पैकेट में भोजन की मात्रा भी कम होने लगी है।सामजसेवी भी अब सरकार से इन मजदूरों के लिए गुहार लगा रहे है कि लॉक डाउन खुले और मजदूर अपनी मजदूरी में जाए।

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निदेशक और संपादक

पत्रकारिता पेशा नहीं ज़िम्मेदारी है और जब बात ज़िम्मेदारी की होती है तब ईमानदारी और जवाबदारी से दूरी बनाना असंभव हो जाता है। एक पत्रकार की जवाबदारी समाज के लिए उतनी ही आवश्यक होती है जितनी परिवार के लिए क्यूंकि समाज का हर वर्ग हर शख्स पत्रकार पर आंख बंद कर उस तरह ही भरोसा करता है जितना एक परिवार का सदस्य करता है। पत्रकारिता मनुष्य को समाज के हर परिवेश हर घटनाक्रम से अवगत कराती है, यह इतनी व्यापक है कि जीवन का कोई भी पक्ष इससे अछूता नहीं है। यह समाज की विकृतियों का पर्दाफाश कर उन्हे नष्ट करने में हर वर्ग की मदद करती है। इसलिए पं. कमलापति त्रिपाठी ने लिखा है कि," ज्ञान और विज्ञान, दर्शन और साहित्य, कला और कारीगरी, राजनीति और अर्थनीति, समाजशास्त्र और इतिहास, संघर्ष तथा क्रांति, उत्थान और पतन, निर्माण और विनाश, प्रगति और दुर्गति के छोटे-बड़े प्रवाहों को प्रतिबिंबित करने में पत्रकारिता के समान दूसरा कौन सफल हो सकता है। View all posts by Gaurav Sharma →
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