जमीन अधिग्रहण और मुआवजे से जुड़े एक हाई-प्रोफाइल मामले में पहले आपसी सहमति से समझौता कर सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये डकारने के बाद भी कानूनी दांव-पेच के जरिए “अतिरिक्त कमाई” की फिराक में दायर अपील को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की युगल पीठ ने सिरे से खारिज कर दिया है। इससे करोड़ों का मुआवजा हासिल करने के बाद उससे मुकरकर दोबारा चांदी काटने की कोशिश नाकाम हो गई। कोर्ट के फैसले से स्पष्ट हो गया है कि एक बार आपसी सहमति से करोड़ों का मुआवजा जेब में भरने के बाद, “कम पैसे मिले” का रोना रोकर कोर्ट का कीमती समय बर्बाद नहीं किया जा सकता ।
मामला जबलपुर की अधारताल तहसील का है। मिलौनीगंज निवासी अजीत यादव और अन्य ने नगर निगम जबलपुर द्वारा उनकी अधिग्रहित अतिरिक्त जमीन के बदले ₹1,17,03,900 (एक करोड़ सत्रह लाख से ज्यादा) का मुआवजा आपसी सहमति से चुपचाप स्वीकार कर लिया लेकिन जैसे ही पैसा खाते में आया, उनकी नीयत डोल गई। उन्होंने और अधिक पैसों की मांग करते हुए हाई कोर्ट में याचिका लगा दी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह तर्क दिया गया कि चूँकि अधिग्रहण की कार्यवाही 2013 के नए भूमि अधिग्रहण अधिनियम के लागू होने के दौरान लंबित थी, इसलिए याचिकाकर्ताओं को इसी नए कानून के तहत उचित और बाजार दर से मुआवजा मिलना चाहिए। शासन की ओर से उप महाधिवक्ता अभिजीत अवस्थी ने दलील दी कि एक बार जब मुआवज़ा स्वीकार कर लिया जाता है, तो वह लेन-देन अंतिम माना जाता है और अपीलकर्ताओं के कहने पर उसे दोबारा नहीं खोला जा सकता। इसलिए अपीलकर्ता एक ही समय पर लाभ स्वीकार करके और साथ ही उसे चुनौती देकर, ‘दोहरी नीति नहीं अपना सकते।
मामले में इंटरविनर ऋतुध्वज अग्रवाल की ओर से अधिवक्ता आदर्श सिंह चौहान ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ताओं ने धोखाधड़ी कर मुआवजा हड़पा है, जबकि जमीन में अन्य लोगों का भी हिस्सा था। याचिकाकर्ता ने उस ज़मीन के मुआवज़े का गबन किया है जो स्वर्गीय श्रीमती लता यादव के हिस्से में आती थी। अजित यादव ने खसरा संख्या 119/3 और 119/2 के संबंध में श्रीमती लता यादव के खिलाफ अपने मालिकाना हक़ के लिए एक मुकदमा डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में दायर किया था, जिसे न्यायालय द्वारा खारिज कर दिया गया है।
इसलिए आपत्ति नहीं उठा सकता अपीलकर्ता : कोर्ट
उन्होंने कोर्ट को ये भी बताया कि याचिकाकर्ताओं ने अपनी पुरानी 6 याचिकाओं की जानकारी भी छिपाई, जो सीधे तौर पर न्याय प्रक्रिया के साथ धोखाधड़ी है। कोर्ट ने शर्त रखी कि अगर अपीलार्थी नए सिरे से सुनवाई चाहते हैं तो पहले मिला हुआ मुआवजा लौटाना होगा, तो अपीलार्थी के वकील ने स्पष्ट रूप से कहा कि उनके मुवक्किल ₹1,17,03,900 की भारी-भरकम राशि वापस करने की स्थिति में नहीं हैं। इस पर कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में, यह माना जा सकता है कि अपीलकर्ता ने आपसी समझौते के तहत ज़मीन की कीमत स्वीकार कर ली थी, और अब अपीलार्थी मुआवजे की अपर्याप्तता के बारे में कोई आपत्ति नहीं उठा सकता है और मुआवज़े के नाम पर इसमें बढ़ोतरी की मांग भी नहीं कर सकता है।
याचिकाकर्त्ता पर कोर्ट ने की सख्त टिप्पणी
कोर्ट ने आगे टिप्पणी की कि उपरोक्त तथ्यों को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि अपीलकर्ताओं ने बिना किसी आपत्ति के, आपसी समझौते के तहत, विचाराधीन ज़मीन के लिए 1,17,03,900/- रुपये की रकम जल्दबाजी में स्वीकार कर ली थी, ऐसा लगता है याचिकाकर्ताओं ने ‘हड़बड़ी’ में मुआवजा इसलिए लिया ताकि दूसरे हिस्सेदार दावा न कर सकें। अब वे पैसा भी नहीं लौटाना चाहते और ज्यादा मुआवजा भी चाहते हैं। यदि अधिग्रहण की प्रक्रिया नगर निगम द्वारा शुरू की गई होती, तो अन्य मालिक भी ज़मीन में अपने हिस्से के रूप में मुआवज़े का दावा करने के लिए आगे आ सकते थे।
अदालत ने रिट अपील को सिरे से खारिज कर दिया
कोर्ट ने कहा अपीलकर्ता 2013 के अधिनियम के तहत भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही में भाग लेकर और राशि वापस करके अपनी सद्भावना (bona fide) नहीं दिखा रहे हैं वे ऐसा इस डर से कर रहे हैं कि कहीं उन्हें मुआवज़े की राशि न मिल पाए, क्योंकि वहाँ अन्य व्यक्ति जैसे कि हस्तक्षेपकर्ता भी मौजूद हैं, जिन्हें मुआवज़े की राशि मिल सकती है। इसलिए, उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए, हमें इस मामले में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं मिलता। इसलिए अदालत ने रिट अपील को “बिना सद्भावना वाली बताते हुए उसे सिरे से खारिज कर दिया।






