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महाराष्ट्र में 1.80 लाख डॉक्टर हड़ताल पर, इमरजेंसी सेवाएं ही रहीं चालू

Written by:Neha Sharma
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इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) महाराष्ट्र ने गुरुवार को राज्यव्यापी हड़ताल का ऐलान किया, जिसके तहत करीब 1.80 लाख डॉक्टर काम से दूर रहे। हड़ताल के चलते सरकारी अस्पतालों में केवल इमरजेंसी सेवाएं ही जारी रहीं।
महाराष्ट्र में 1.80 लाख डॉक्टर हड़ताल पर, इमरजेंसी सेवाएं ही रहीं चालू

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) महाराष्ट्र ने गुरुवार को राज्यव्यापी हड़ताल का ऐलान किया, जिसके तहत करीब 1.80 लाख डॉक्टर काम से दूर रहे। हड़ताल के चलते सरकारी अस्पतालों में केवल इमरजेंसी सेवाएं ही जारी रहीं, जबकि ओपीडी, ऑपरेशन थिएटर और नियमित स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह ठप हो गईं। मरीजों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा और कई जगहों पर इलाज के लिए उन्हें निजी अस्पतालों का सहारा लेना पड़ा।

डॉक्टरों का विरोध महाराष्ट्र मेडिकल काउंसिल (MMC) में होम्योपैथी डॉक्टरों को रजिस्ट्रेशन की अनुमति देने के राज्य सरकार के फैसले को लेकर है। उनका आरोप है कि सरकार एलोपैथिक और होम्योपैथिक डॉक्टरों को बराबर का दर्जा देने की कोशिश कर रही है। आईएमए का कहना है कि यह कदम न केवल मेडिकल सिस्टम को कमजोर करेगा बल्कि मरीजों की जान से भी खिलवाड़ है। डॉक्टरों का मानना है कि यह निर्णय विज्ञान और चिकित्सा के स्थापित मानकों के खिलाफ है।

महाराष्ट्र में 1.80 लाख डॉक्टर हड़ताल पर

हड़ताल पर बैठे डॉक्टरों ने स्पष्ट किया कि एक एलोपैथी डॉक्टर बनने के लिए बेहद कठिन और लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसके लिए पहले NEET परीक्षा पास करनी होती है, फिर साढ़े चार साल की MBBS डिग्री और उसके बाद तीन साल की मास्टर्स डिग्री (MD या MS) पूरी करनी होती है। साथ ही, सरकारी अस्पतालों में लंबी और कठोर इंटर्नशिप करनी पड़ती है। इसके विपरीत, सरकार होम्योपैथिक डॉक्टरों को सिर्फ छह महीने का शॉर्ट-टर्म कोर्स करवाकर एलोपैथिक दवाएं लिखने की अनुमति दे रही है। डॉक्टरों का कहना है कि यह चिकित्सा की गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा के साथ समझौता है।

आईएमए महाराष्ट्र ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने यह निर्णय वापस नहीं लिया तो आंदोलन और तेज किया जाएगा। उन्होंने कहा कि चिकित्सा पद्धतियों की पहचान और योग्यता से समझौता करने से समाज में भ्रम और असुरक्षा फैलेगी। वहीं, सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि यह कदम स्वास्थ्य सेवाओं को गांव-गांव तक पहुंचाने के लिए उठाया गया है, ताकि मरीजों को प्राथमिक स्तर पर इलाज मिल सके। लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि जनता की भलाई के नाम पर इस तरह के फैसले मरीजों के जीवन को खतरे में डाल देंगे।