वक्फ कानून पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश सरकार पर प्रहार से कहीं ज्यादा, TMC सांसद डेरेक ओ ब्रायन क्या बोले

टीएमसी नेता ने अपने ब्लॉग में कहा कि यह कानून संविधान की वैधता के सिद्धांत को चुनौती देता है, जो यह मानता है कि कानून आम तौर पर वैध होते हैं, जब तक कि उनकी असंवैधानिकता स्पष्ट रूप से सिद्ध न हो।
वक्फ कानून पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश सरकार पर प्रहार से कहीं ज्यादा, TMC सांसद डेरेक ओ ब्रायन क्या बोले

त्रिणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 के कुछ प्रमुख प्रावधानों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक लगाए जाने के बाद केंद्र सरकार की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने इसे सरकार के लिए केवल एक चेतावनी से कहीं अधिक बताया, जो छल विधान के जरिए काम कर रही है। ओ ब्रायन ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को यह जांचना होगा कि क्या यह कानून समानता और धार्मिक स्वतंत्रता जैसे अधिकारों का उल्लंघन करता है। उन्होंने संसद में इस बिल के पारित होने की प्रक्रिया को छलपूर्ण और टालमटोल करार दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को वक्फ अधिनियम के कुछ विवादास्पद प्रावधानों पर रोक लगा दी, जिसमें यह शर्त शामिल है कि वक्फ संपत्ति समर्पित करने के लिए व्यक्ति को कम से कम पांच साल तक इस्लाम का पालन करने वाला होना चाहिए। इसके अलावा, एक नामित अधिकारी द्वारा निजी नागरिकों के अधिकारों का निर्णय करने का प्रावधान भी रोका गया। ओ ब्रायन ने कहा कि संसद में बिल पारित करने की प्रक्रिया में संसदीय नियमों का मखौल उड़ाया गया, जिसमें विपक्ष के असहमति नोट्स को व्हाइटनर से मिटाने का आरोप भी शामिल है।

संविधान की वैधता का सिद्धांत

टीएमसी नेता ने अपने ब्लॉग में कहा कि यह कानून संविधान की वैधता के सिद्धांत को चुनौती देता है, जो यह मानता है कि कानून आम तौर पर वैध होते हैं, जब तक कि उनकी असंवैधानिकता स्पष्ट रूप से सिद्ध न हो। उन्होंने चेतावनी दी कि हाल के वर्षों में अल्पसंख्यक अधिकारों को प्रतिबंधित करने और धार्मिक स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने वाले कानूनों के चलन को देखते हुए, इस सिद्धांत पर पुनर्विचार की जरूरत है। ओ ब्रायन ने बीजेपी सरकार पर विशिष्ट समुदायों को निशाना बनाने वाले कस्टमाइज्ड कानून बनाने का आरोप लगाया, जो नागरिकों को एकसमान कानून के तहत नहीं, बल्कि विशेष और प्रतिबंधात्मक कानूनी व्यवस्थाओं के तहत देखते हैं।

राज्य को तय करने की शक्ति

उन्होंने कहा कि वक्फ अधिनियम जैसे कानून राज्य को यह तय करने की शक्ति देते हैं कि अल्पसंख्यक समुदाय का वैध सदस्य कौन है, जो लोकतंत्र के लिए खतरा है। ओ ब्रायन ने सुप्रीम कोर्ट से इस कानून के संवैधानिकता पर गंभीर सवाल उठाए, जैसे कि क्या यह कानून समानता (अनुच्छेद 14), धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25 और 26) और धर्म के आधार पर भेदभाव निषेध (अनुच्छेद 15) का उल्लंघन करता है। उन्होंने उम्मीद जताई कि सुप्रीम कोर्ट इन सवालों का जवाब देगा और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करेगा।

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