क्या आप जानते हैं पेड़ों में क्यों लगाया जाता है सफेद रंग

क्या आप जानते हैं पेड़ों में क्यों लगाया जाता है सफेद रंग

अजब-गजब: अक्सर आपने देखा होगा जंगलों में सड़क किनारे या बाग़ बगीचे और नदी किनारे पेड़ो में नीचे सफ़ेद रंग पोता जाता है| यह दिखने में काफी खूबसूरत दिखाई देता है| लेकिन यह सिर्फ पेड़ो को खूबसूरत दिखाने के लिए नहीं किया जाता| इसके इसके पीछे कई कारण होते है| जिसके बारे में शायद ही आप जानते होंगे।

ऐसा इसलिए किया जाता है कि हरे-भरे पेड़ों को और ज्यादा मजबूती मिले। आपने देखा होगा कि पेड़ों में दरारें आ जाती हैं और उनकी छाल निकलने लगती है, जिसकी वजह से पेड़ कमजोर हो जाते हैं। इसीलिए उन्हें पेंट कर दिया जाता है, ताकि उनकी मजबूती बनी रहे और पेड़ों की उम्र लंबी हो।

पेड़ों के निचले हिस्से में पेंट करने का यह तरीका काफी पुराना है। पेंट करने के दौरान अगर पेड़ का कोई हिस्सा डैमेज दिखता है तो उसे भी हाईलाइट कर दिया जाता है, ताकि आगे उसका अधिक ख्याल रखा जा सके।

इसके अलावा पेड़ों पर रंग करने का मतलब है कि ये पेड़ सरकारी प्रौपर्टी हैं| यह वन विभाग द्वारा कराया जाता है| इसके साथ ही पेड़ पर सफ़ेद रंग लगाने का ये भी मतलब है कि सरकार के इजाजत के बिना आप पेड़ को नहीं काट सकते|

पेड़ों को रंग से पोतने से उनकी सुरक्षा में भी सुधार होता है। यह इस बात का संकेत होता है कि वो पेड़ वन विभाग की नजर में हैं| बिना अनुमति इनको काटा नहीं जा सकता| कुछ जगहों पर पेड़ों को रंगने के लिए केवल सफेद पेंट का इस्तेमाल किया जाता है, कई जगहों पर लाल और सफ़ेद रंगों का भी उपयोग किया जाता है।

Gaurav Sharma
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निदेशक और संपादक

पत्रकारिता पेशा नहीं ज़िम्मेदारी है और जब बात ज़िम्मेदारी की होती है तब ईमानदारी और जवाबदारी से दूरी बनाना असंभव हो जाता है। एक पत्रकार की जवाबदारी समाज के लिए उतनी ही आवश्यक होती है जितनी परिवार के लिए क्यूंकि समाज का हर वर्ग हर शख्स पत्रकार पर आंख बंद कर उस तरह ही भरोसा करता है जितना एक परिवार का सदस्य करता है। पत्रकारिता मनुष्य को समाज के हर परिवेश हर घटनाक्रम से अवगत कराती है, यह इतनी व्यापक है कि जीवन का कोई भी पक्ष इससे अछूता नहीं है। यह समाज की विकृतियों का पर्दाफाश कर उन्हे नष्ट करने में हर वर्ग की मदद करती है। इसलिए पं. कमलापति त्रिपाठी ने लिखा है कि," ज्ञान और विज्ञान, दर्शन और साहित्य, कला और कारीगरी, राजनीति और अर्थनीति, समाजशास्त्र और इतिहास, संघर्ष तथा क्रांति, उत्थान और पतन, निर्माण और विनाश, प्रगति और दुर्गति के छोटे-बड़े प्रवाहों को प्रतिबिंबित करने में पत्रकारिता के समान दूसरा कौन सफल हो सकता है। View all posts by Gaurav Sharma →
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