DU चुनाव: क्यों बीजेपी-कांग्रेस-लेफ्ट के लिए छात्रसंघ बना ‘मिनी पॉलिटिकल बैटलग्राउंड’?

DU चुनाव: क्यों बीजेपी-कांग्रेस-लेफ्ट के लिए छात्रसंघ बना ‘मिनी पॉलिटिकल बैटलग्राउंड’?

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (DUSU) चुनाव 2025 के लिए गुरुवार को मतदान प्रक्रिया शांतिपूर्वक पूरी हो गई। केंद्रीय पैनल की चार महत्वपूर्ण सीटों अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव पर इस बार 21 उम्मीदवारों ने अपनी किस्मत आजमाई। अब शुक्रवार को मतगणना होगी और नतीजे घोषित किए जाएंगे। पूरे परिसर में दिनभर चुनावी हलचल रही और छात्रों ने उत्साह से वोट डाला। मुख्य मुकाबला हमेशा की तरह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) और कांग्रेस समर्थित नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) के बीच माना जा रहा है।

राजनीति की नर्सरी कहा जाता है DUSU

दिल्ली यूनिवर्सिटी का छात्रसंघ चुनाव केवल कैंपस की राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे राष्ट्रीय राजनीति की नर्सरी कहा जाता है। यहां जीत-हार से ज्यादा मायने रखता है छवि और धारणा। यही कारण है कि हर साल छात्र संगठन इस चुनाव में पूरी ताकत झोंकते हैं। 1950-60 के दशक से शुरू हुए इन चुनावों ने धीरे-धीरे राष्ट्रीय दलों को भी आकर्षित किया। पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली और पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जैसे दिग्गज नेताओं ने यहीं से छात्र राजनीति का सफर शुरू किया था। इस चुनाव को छात्रों का भविष्य गढ़ने वाला मंच माना जाता है।

सख्त नियम और साफ छवि पर जोर

इस बार चुनाव प्रक्रिया को और पारदर्शी बनाने पर जोर दिया गया है। उम्मीदवारों से एक लाख रुपये का जमानत बॉंड मांगा गया। साथ ही पोस्टर-बैनर, रोड शो, रैली और लाउडस्पीकर पर पूरी तरह रोक लगा दी गई। नियम तोड़ने पर 25 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाने का प्रावधान है। प्रशासन का दावा है कि इन कदमों से स्वच्छ और निष्पक्ष चुनाव कराना आसान होगा। छात्र संगठनों ने भी नए तरीके अपनाए हैं। रोड शो और पोस्टरों की जगह सोशल मीडिया कैंपेन, डिजिटल वीडियो और लाइव इंटरैक्शन को प्राथमिकता दी गई, जिससे प्रचार का अंदाज बदला नजर आया।

मुद्दे और छात्रों की उम्मीदें

DUSU चुनाव हर बार नए चेहरे तो लाता है, लेकिन मुद्दे लगभग वही रहते हैं। छात्रों की चिंता परिवहन, फीस, हॉस्टल की कमी, महिला सुरक्षा और पानी जैसी बुनियादी समस्याओं पर टिकी रहती है। जातिगत, भाषाई और क्षेत्रीय विविधता भी चुनावी माहौल को प्रभावित करती है। इस बार सोशल मीडिया प्रचार ने मुकाबले को और धार दी है। इंस्टाग्राम, फेसबुक और ट्विटर पर छात्र संगठनों ने आक्रामक कैंपेन चलाए। कुल मिलाकर यह चुनाव सिर्फ वोटों की गिनती का खेल नहीं है, बल्कि भविष्य की राजनीति के नेताओं के लिए छवि बनाने का मंच है। अब सबकी निगाहें शुक्रवार पर टिकी हैं, जब नतीजों से तय होगा कि 2025 में दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्रों ने किसे अपना नेता चुना है।

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