जगन्नाथ रथ यात्रा: पुरी में जारी है रथ निर्माण का कार्य, जानिए इस साल कब शुरू होगी यात्रा, इससे जुड़ी अनोखी परंपराएं

यह सिर्फ एक धार्मिक यात्रा नहीं बल्कि सदियों पुरानी परंपराओं, शिल्पकला और लोक आस्था का अनूठा संगम है। रथ निर्माण में पीढ़ियों से जुड़े कारीगरों की भूमिका, भगवान के नगर भ्रमण की परंपरा, गुंडिचा मंदिर में नौ दिवसीय प्रवास और वापसी यात्रा के दौरान होने वाले विशेष अनुष्ठान इस महापर्व को विशिष्ट बनाते हैं।
Jagannath Rath Yatra

Jagannath Rath Yatra

इस साल भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा की तैयारियां पुरी में जोर-शोर से चल रही है। अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर पारंपरिक वैदिक रीति-रिवाजों और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के रथों के निर्माण का कार्य प्रारंभ किया गया। रथ निर्माण के लिए चयनित लकड़ियों को मंदिर परंपरा के अनुसार पूजा-अर्चना के बाद उपयोग में लाया जा रहा है।

पुरी के रथ निर्माण स्थल ‘रथ खाला’ में सैकड़ों पारंपरिक कारीगर नीम की पवित्र लकड़ी से भगवानों के तीन विशाल रथ तैयार कर रहे हैं। विशेष बात यह है कि इन रथों का निर्माण हर वर्ष नए सिरे से किया जाता है और इन्हें पारंपरिक तकनीक से बनाया जाता है। इस साल जगन्नाथ रथ यात्रा 16 जुलाई से शुरु होगी। यात्रा से पहले कई पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए जाएंगे जिनमें स्नान पूर्णिमा, अनवसरा और नवयौवन दर्शन प्रमुख हैं।

जगन्नाथ रथ यात्रा की तैयारियां शुरु

जगन्नाथ रथ यात्रा हिंदू धर्म के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजनों में से एक मानी जाती है। इस दौरान भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा भव्य रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर तक यात्रा करते हैं। इस यात्रा में देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं और रथों को खींचना अपना सौभाग्य मानते हैं। रथ यात्रा की एक विशेषता यह है कि तीनों रथ हर वर्ष नए बनाए जाते हैं। भगवान जगन्नाथ का रथ नंदीघोष, भगवान बलभद्र का तलध्वज और देवी सुभद्रा का दर्पदलन कहलाता है। इन रथों का निर्माण सदियों पुरानी परंपराओं और निश्चित मापदंडों के अनुसार किया जाता है।

आस्था, संस्कृति और समरसता का पर्व

शास्त्रों में कहा गया है कि रथ पर विराजमान भगवान जगन्नाथ के दर्शन मात्र से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि हर वर्ष करोड़ों श्रद्धालु “जय जगन्नाथ” के उद्घोष के साथ रथों को खींचने के लिए पुरी पहुंचते हैं। यह पर्व धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक एकता और मानव सेवा का भी संदेश देता है। पुरी प्रशासन और मंदिर प्रबंधन ने रथ यात्रा को लेकर सुरक्षा, यातायात और श्रद्धालुओं की सुविधाओं की व्यापक तैयारियां शुरू कर दी हैं। वहीं, भारत के अलावा दुनिया भर में स्थित इस्कॉन केंद्रों और अन्य जगन्नाथ मंदिरों में भी रथ यात्रा उत्सव धूमधाम से मनाने की तैयारियां चल रही हैं।

रथ यात्रा से जुड़ी अनोखी परंपराएं

  • जगन्नाथ रथ यात्रा एक धार्मिक आयोजन होने के साथ कई अनूठी परंपराओं का संगम भी है। मान्यता है कि रथ यात्रा शुरू होने के समय भगवान जगन्नाथ का रथ तभी आगे बढ़ता है जब भगवान की इच्छा होती है। कई बार हजारों श्रद्धालुओं के प्रयास के बावजूद रथ कुछ समय तक स्थिर रहता है और फिर अचानक चल पड़ता है, जिसे भक्त दैवीय संकेत मानते हैं।
  • स्नान यात्रा के दौरान भगवानों को 108 कलशों के जल से स्नान कराया जाता है। इसके बाद उन्हें अस्वस्थ माना जाता है और लगभग 15 दिनों तक सार्वजनिक दर्शन बंद रहते हैं। इस अवधि को ‘अनवसर’ कहा जाता है। इसके बाद नवयौवन दर्शन होते हैं और फिर भगवान रथ यात्रा के लिए निकलते हैं।
  • रथ यात्रा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अनुष्ठान ‘छेरा पहरा’ है जिसमें पुरी के गजपति महाराज स्वर्ण झाड़ू से रथों की सफाई करते हैं। यह परंपरा सामाजिक समानता और सेवा भाव का प्रतीक मानी जाती है, जो संदेश देती है कि भगवान के समक्ष सभी समान हैं।
  • यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ अपनी मौसी के घर माने जाने वाले गुंडिचा मंदिर जाते हैं और वहां नौ दिनों तक विराजमान रहते हैं। वापसी के समय मौसी मां मंदिर में भगवान को उनका प्रिय ‘पोडा पिठा’ भोग लगाया जाता है, जिसकी भी विशेष धार्मिक मान्यता है।
Shruty Kushwaha
लेखक के बारे में
Shruty Kushwaha

पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (M.J.), 2001. 2001 से 2013 तक ईटीवी हैदराबाद, सहारा न्यूज दिल्ली-भोपाल और लाइव इंडिया मुंबई में कार्य.

2001 में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (M.J, Masters of Journalism)। 2001 से 2013 तक ईटीवी हैदराबाद, सहारा न्यूज दिल्ली-भोपाल, लाइव इंडिया मुंबई में कार्य अनुभव। साहित्य पठन-पाठन में विशेष रूचि। View all posts by Shruty Kushwaha →
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