घरेलू कामगारों के न्यूनतम वेतन पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता, CJI बोले- ‘नौकरियां खत्म हो सकती हैं’

सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम वेतन तय करने की मांग पर गंभीर चिंता जताई है। CJI सूर्यकांत ने कहा कि ऐसे आदेश से कई परिवार कामगार रखना बंद कर सकते हैं, जिससे उन्हीं का नुकसान होगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वह कानून बनाने का निर्देश नहीं दे सकती।
Domestic workers

Domestic workers

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम वेतन निर्धारित करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए इसके सामाजिक और आर्थिक परिणामों को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत ने कहा कि इस तरह का कोई भी आदेश जमीनी स्तर पर उल्टा असर डाल सकता है, जिससे कई घरेलू कामगार अपनी नौकरी खो सकते हैं।

अदालत ने माना कि घरेलू कामगार देश के सबसे शोषित वर्गों में से एक हैं, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि न्यूनतम वेतन तय करना एक नीतिगत मामला है और अदालत कानून बनाने की प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।

‘लोग कामगार रखना बंद कर देंगे’

सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा कि यह कहना बहुत आसान है कि घरेलू कामगारों के अधिकारों का हनन हो रहा है, लेकिन अदालत को अपने फैसले के व्यावहारिक असर को भी देखना होगा।

“अगर हम घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम वेतन अनिवार्य कर देते हैं, तो इसका क्या नतीजा होगा? बहुत से लोग उन्हें काम पर रखना बंद कर देंगे। इससे उन्हीं लोगों को नुकसान होगा, जिनकी हम मदद करना चाहते हैं।” — CJI सूर्यकांत

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह मुद्दा सिर्फ अधिकारों का नहीं, बल्कि इसके सामाजिक-आर्थिक प्रभाव से भी जुड़ा हुआ है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

एजेंसियों के जरिए होता है सबसे ज्यादा शोषण

CJI ने अपने व्यक्तिगत अनुभव का हवाला देते हुए बताया कि आजकल बड़े शहरों में प्लेसमेंट एजेंसियों के माध्यम से घरेलू कामगारों को रखने का चलन बढ़ गया है, जहां सबसे ज्यादा शोषण होता है। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा, “एक मामले में एजेंसी ने संस्थान से 54,000 रुपये लिए, लेकिन काम करने वाली महिला को सिर्फ 19,000 रुपये दिए गए।”

उन्होंने कहा कि जब कोई परिवार सीधे किसी कामगार को रखता है, तो एक विश्वास और जिम्मेदारी का रिश्ता बनता है। लेकिन एजेंसी मॉडल इस मानवीय पहलू को पूरी तरह खत्म कर देता है और मजदूरों का शोषण बढ़ता है।

अदालत कानून नहीं बना सकती

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने दलील दी कि घरेलू कामगारों को न्यूनतम वेतन कानून के दायरे से बाहर रखना एक तरह की ‘बेगार’ (बंधुआ मजदूरी) है और यह मानवाधिकारों का उल्लंघन है।

इस पर CJI ने साफ किया कि याचिका में ऐसी मांग की जा रही है जो कानून बनाने के समान है। उन्होंने कहा, “अदालत राज्यों को यह निर्देश नहीं दे सकती कि वे अपने न्यूनतम वेतन कानूनों में घरेलू कामगारों को शामिल करें। यह न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र से बाहर है।”

बेंच में शामिल जस्टिस जे.बी. पारदीवाला ने भी कहा कि मौजूदा श्रम कानूनों में घरेलू काम को ‘पर्सनल सर्विस कॉन्ट्रैक्ट’ के रूप में देखा जाता है, जिसमें न्यूनतम वेतन का प्रावधान नहीं है, हालांकि कुछ सामाजिक सुरक्षा लाभ मिलते हैं।

हाईकोर्ट जाने का सुझाव

जब याचिकाकर्ताओं ने बताया कि देश के 15 राज्यों ने पहले ही घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम वेतन तय कर दिया है, तो CJI ने सवाल किया कि फिर इस मामले को लेकर संबंधित हाईकोर्ट का दरवाजा क्यों नहीं खटखटाया गया। कोर्ट ने संकेत दिया कि यदि राज्य स्तर पर इस पर सहमति बन रही है, तो हाईकोर्ट एक बेहतर मंच हो सकता है। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कोई सीधा आदेश देने से परहेज किया है, जिससे यह स्पष्ट है कि यह मुद्दा नीतिगत और विधायी स्तर पर ही सुलझाया जाएगा।

Ankita Chourdia
लेखक के बारे में
Follow Us :GoogleNews