सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अशोका विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद के खिलाफ निचली अदालत की कार्यवाही पर रोक लगा दी। प्रोफेसर पर ऑपरेशन सिंदूर से संबंधित एक विवादास्पद सोशल मीडिया पोस्ट के लिए दो पुलिस मामले दर्ज हैं। जस्टिस सूर्यकांत और जॉयमल्या बागची की बेंच ने निचली अदालत को निर्देश दिया कि अगली सुनवाई तक प्रोफेसर के खिलाफ कोई आरोप तय नहीं किए जाएंगे।
महमूदाबाद को 18 मई को गिरफ्तार किया गया था, जब उन्होंने सरकार द्वारा ऑपरेशन सिंदूर के ब्रीफिंग के लिए कर्नल सोफिया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका सिंह के चयन पर सोशल मीडिया पोस्ट किया था। यह ऑपरेशन 22 अप्रैल को पहलगाम हमले का बदला लेने के लिए शुरू किया गया था। तीन दिन बाद उन्हें जमानत मिली लेकिन सख्त शर्तों के साथ, जिसमें उनके पासपोर्ट को जमा करना और मामले से संबंधित कोई भी लेख, पोस्ट या भाषण देने पर रोक शामिल थी।
एससी ने क्या कहा
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान प्रोफेसर का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि पुलिस ने उनके सोशल मीडिया टिप्पणियों के लिए भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 152 का इस्तेमाल किया, जो देश की संप्रभुता पर हमले से संबंधित है जो दुर्भाग्यपूर्ण है। विशेष जांच दल (एसआईटी) ने कोर्ट को बताया कि उसने प्रोफेसर के खिलाफ दर्ज एक मामले में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की है।
राय व्यक्त करने की अनुमति
कोर्ट ने प्रोफेसर की जमानत शर्तों में ढील देते हुए उन्हें लेख लिखने और अपनी राय व्यक्त करने की अनुमति दी, सिवाय इसके मामले से संबंधित ऑनलाइन सामग्री साझा करने के। प्रोफेसर पर बीएनएस की धाराओं 152, 353, 79 और 196(1) के तहत आरोप लगाए गए थे जिनमें देश की एकता और अखंडता को खतरे में डालने, सार्वजनिक शरारत, महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुंचाने और धार्मिक आधार पर शत्रुता को बढ़ावा देने जैसे अपराध शामिल हैं।






