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“आरक्षण, असुरक्षा और यूजीसी विनियम: सामान्य वर्ग के मन में उठते सवाल”, “क्या समानता के नाम पर नई खाई बन रही है?

Written by:Atul Saxena
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अब तो ऐसा लगने लगा है जैसे हमने सामान्य वर्ग में पैदा होकर कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया है। हर समय हमारे ऊपर एक तलवार लटकती रहती है।
“आरक्षण, असुरक्षा और यूजीसी विनियम: सामान्य वर्ग के मन में उठते सवाल”, “क्या समानता के नाम पर नई खाई बन रही है?

वैसे तो जब से होश संभाला तब से ही कुछ-कुछ लगने लगा था पर पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह से आरक्षण की मात्रा बढ़ती जा रही है। सामान्य वर्ग उपेक्षित होता जा रहा है। लगने लगा है काश मैंने सामान्य वर्ग में जन्म नहीं लिया होता। तो आज हम और हमारे बच्चे भी शायद उच्च पदों पर आसीन होते। संविधान निर्माण के समय दलित वर्ग के उत्थान के लिए केवल 10 वर्ष के लिए कुछ आरक्षण का प्रावधान किया गया था पर आरक्षण रूपी दानव 10 वर्ष में खत्म होने की जगह उत्तरोत्तर बढ़ता ही चला गया और इसने इतना विशालकाय रूप धारण कर लिया कि दलितों का पूर्ण रूपेण उत्थान और सवर्णों का पतन हो गया।

किसी भी परीक्षा में जहां 90 प्रतिशत वाले सवर्ण को भी दाखिला नहीं मिल पाता वहीं आरक्षित वर्ग को 36 परसेंट पर ही दाखिला मिल जाता है। जहां सामान्य वर्ग के फॉर्म की फीस बहुत अधिक होती है वहीं आरक्षित वर्ग कुछ ही रुपयों में फॉर्म भर सकता है। नीट, क्लेट और आईआईटी जैसी परीक्षा में योग्य सवर्ण छात्र रह जाते हैं और आरक्षित छात्र कम योग्य होते हुए भी डॉक्टर, इजीनियर और वकील बन कर मरीजों, क्लाइंटों व देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।

अभी नीट के कट ऑफ में माइनस 40 फीसदी वाला छात्र डॉक्टर की पढ़ाई के लिए योग्य माना गया। इसके विपरीत आज तक सामान्य वर्ग के हित के लिए कोई आयोग नहीं बना। सरकारी योजनाएं नहीं लागू हुई। नौकरी पदोन्नति व घर के अलॉटमेंट आदि में भी सामान्य वर्ग को ही सबसे पीछे रखा जाता है। देश के लिए सबसे ज्यादा करने पर भी हमें सबसे कम सुविधाएं मिली।

यहां तक कि राज्य प्रशासनिक सेवाओं व देश की सर्वोच्च परीक्षा केंद्र प्रशासनिक सेवा में भी आरक्षण लागू है। जहां सामान्य वर्ग की आयु सीमा 21 से 32 वर्ष है। वह छह बार परीक्षा दे सकता है। वहीं ओबीसी के लिए 21 से 35 वर्ष व 9 प्रयास व एससी एसटी के लिए 21 से 37 वर्ष व अनगिनत प्रयास है। बताइए यह आरक्षित व्यक्ति ही आजकल देश का भविष्य तय कर रहे हैं और सवर्ण योग्य व्यक्ति प्राइवेट नौकरी या कोई छोटा-मोटा धंधा करने पर मजबूर है।

इस तरह सवर्ण वर्ग पहले से ही इन तनावों से जूझ रहा है और उस पर से यूजीसी के समता विनियम ने आग में घी डालने का काम किया है। उनका कहना है इसे हमने उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के लिए लागू किया है। पर इससे जातिगत भेदभाव और गहरा हो गया है। इससे सामान्य वर्ग में असुरक्षा की भावना बढ़ गई है। क्योंकि पहले से ही हर जिले में एससी एसटी कोर्ट बने हुए हैं। जहां थोड़ी सी कोई बात होने पर या फिर दलितों द्वारा झूठी शिकायत करने पर भी बिना किसी सुनवाई के सवर्णों को सजा सुना दी जाती है। सवर्ण वैसे ही भयभीत है और अब कहां का न्याय है दलित वर्ग अगर कुछ भी कहता रहे तो उसके विरुद्ध कार्यवाही नहीं हो और सवर्ण जरा भी कुछ कह दे उसे जेल में भिजवा दो।

यूजीसी द्वारा विनियम लागू किये जाने के तुरंत बात की घटना को ही ले लीजिए दिल्ली के जाने-माने श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में एक दलित छात्र द्वारा सवर्ण लड़की को प्रपोज किया गया । उसके मना करने पर छात्र ने उसके खिलाफ बुरे व्यवहार का मामला दर्ज कर दिया। पुलिस में जाने के डर से लड़की के घरवालों ने 50,000 रुपये देकर मामला सुलझवाया। जहां आरक्षित वर्ग कम खर्चे में ही बच्चों को पढ़ा लेता है व उसे अन्य कई तरह की सुविधायें मिल जातीं हैं। वहीं सामान्य वर्ग इन सब सुविधाओं से वंचित रह जाता है।

सामान्य वर्ग में पैदा होना अपराध जैसा 

इस मामले में कानून का तर्क है कि आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के तहत सामान्य वर्ग को भी सुविधायें दी जाती है पर वास्तविकता यह है कि इसका लाभ भी दलित वर्ग ही उठाता है। वैसे इसमें सवर्णों की ही कमजोरी है उनकी सबसे बड़ी विडंबना है कि वे अपने आप को किसी भी सूरत में बेचारा नहीं दिखाना चाहते।

अब तो ऐसा लगने लगा है जैसे हमने सामान्य वर्ग में पैदा होकर कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया है। हर समय हमारे ऊपर एक तलवार लटकती रहती है। दलित वर्ग सामान्य वर्ग के सिर पर चढ़कर नाच रहा है । अभी कुछ दिन पूर्व ही मध्य प्रदेश के कलेक्टर संतोष वर्मा ब्राह्मणों की बेटियों पर एक विवादित बयान देकर ब्राह्मणों के आक्रोश के घेरे में है । लेकिन इसके बाद भी उन्होंने एक बयान और दिया उत्तर प्रदेश के सांसद चंद्रशेखर रावण का हवाला देते हुए उन्होंने कहा तुम कितने संतोष वर्मा को मारोगे हर घर से एक संतोष वर्मा निकलेगा।

दोस्त बनाने से पहले 10 बार सोचेगा छात्र 

यूजीसी के विनियम के बाद तो सवर्ण छात्र आरक्षित वर्ग के छात्र को अपना दोस्त बनाने से पहले 10 बार सोचेगा। क्योंकि दोस्ती में कई बार मुंह से कोई भी बात निकल जाती है और वह किसी भी मुश्किल में पड़ सकता है। वैसे ओबीसी के छात्र ने भी अपने इंटरव्यू में कहा है कि यह विनियम गलत है इससे हम अपने दोस्तों से दूर हो जाएंगे। और वास्तव में यह विनियम देश के विभिन्न वर्गों मे एक बहुत बड़ी खाई पैदा कर रहा है। ऐसी दूरी जो आने वाले समय में देश के पतन का कारण बन सकती है।

इस तरह से तो हमारे बच्चे कॉलेज और यूनिवर्सिटी में असुरक्षित से हो गए हैं। किसी की योग्यता से जलने वाला दलित छात्र झूठे आरोप में उसका भविष्य बरबाद कर सकता है। यहां यह भी विचारणीय है कि झूठी शिकायत करने वालों के लिए दंड का कोई प्रावधान नहीं है। इसे एक टूल किट के रूप में स्थापित किया जा रहा है। और काले कानून का नाम दिया जा रहा है।

निगाहें अब अदालत के फैसले पर 

क्या यह देश को फिर से गुलाम बनाने की तैयारी नहीं है? सवर्णों के अलावा भी ओबीसी वर्ग के कई लोग भी इसका विरोध कर रहे हैं। विरोध के बाद यूजीसी के कमिश्नर ने इस्तीफा दे दिया। बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री द्वारा इसके विरोध में इस्तीफा दिए जाने के बाद बीजेपी पदाधिकारियों के इस्तीफे की होड़ सी लग गई है। पर क्या कारण है कि सबका साथ सबका विकास का नारा देने वाले मोदी और उनके मंत्री सब चुपचाप बैठे हैं। इसके विरोध में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई। जिसमें कोर्ट ने अगली सुनवाई तक इस विनियम पर स्टे लगा दिया है। देखो अब आगे क्या होता है।

लेख अनुसुइया शर्मा द्वारा लिखा गया है, वह धौलपुर राजस्थान की निवासी हैं और पेशे से लेखिका और कवियत्री हैं