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बंगाल में OBC आरक्षण पर सुवेंदु सरकार का बड़ा फैसला! मुस्लिमों को सूची से किया बाहर

Written by:Ankita Chourdia
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कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश के बाद पश्चिम बंगाल में ओबीसी आरक्षण के समीकरण बदल गए हैं। दरअसल मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी की सरकार ने 2010 से पहले की सूची लागू कर मुस्लिमों समेत कई समुदायों को बाहर किया है।
बंगाल में OBC आरक्षण पर सुवेंदु सरकार का बड़ा फैसला! मुस्लिमों को सूची से किया बाहर

पश्चिम बंगाल में ओबीसी आरक्षण को लेकर मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया है। दरअसल कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेश के अनुपालन में, राज्य सरकार ने एक नई अधिसूचना जारी की है, जिसके तहत पश्चिम बंगाल में कई समुदायों के ओबीसी दर्जे को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया गया है। इस निर्णय से राज्य के जातिगत समीकरणों में महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं।

दरअसल सुवेंदु सरकार ने मंगलवार को 66 समुदायों को नियमित कर दिया। ये वे समुदाय हैं जो वर्ष 2010 से पहले राज्य की ओबीसी आरक्षण सूची में शामिल थे। यह फैसला नई सरकार द्वारा मौजूदा राज्य ओबीसी सूची को रद्द किए जाने के कुछ ही दिनों बाद आया है। इस अधिसूचना के माध्यम से, पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग ने घोषणा की है कि ये समुदाय, जिनमें से कई मुस्लिम हैं, अब सरकारी सेवाओं और पदों में 7 प्रतिशत आरक्षण के पात्र होंगे।

जानिए कौन से समुदाय शामिल हैं?

वहीं इस सूची में कपाली, कुर्मी, नाई (नेपित), तांती, धानुक, कसाई, खंडैत, तुरहा, पहाड़िया मुस्लिम, देवंगा और हज्जाम (मुस्लिम) जैसे कई पारंपरिक और सामाजिक समुदाय शामिल हैं। अधिसूचना में यह भी स्पष्ट किया गया है कि जिन व्यक्तियों ने अनुसूचित जातियों से ईसाई धर्म अपनाया है, उन्हें और उनके वंशजों को भी इस नई सूची में स्थान दिया गया है।

ओबीसी आरक्षण अब 7 प्रतिशत तक सीमित

दरअसल यह अधिसूचना मई 2024 में कलकत्ता उच्च न्यायालय के एक महत्वपूर्ण आदेश के पालन में जारी की गई थी। इस आदेश में पश्चिम बंगाल के कई समुदायों के ओबीसी दर्जे को रद्द करते हुए उसे अवैध घोषित किया गया था। न्यायालय ने ‘पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा) (सेवाओं और पदों में रिक्तियों का आरक्षण) अधिनियम, 2012’ के तहत नामित कई वर्गों को समाप्त कर दिया। इसके अतिरिक्त, अदालत ने श्रेणी-वार ओबीसी आरक्षण संरचना को भी खत्म कर दिया, जिसमें श्रेणी A (अधिक पिछड़े वर्ग) के लिए 10 प्रतिशत और श्रेणी B (पिछड़े वर्ग) के लिए 7 प्रतिशत आरक्षण निर्धारित था। इस न्यायिक फैसले के बाद, राज्य में कुल ओबीसी आरक्षण अब 7 प्रतिशत तक सीमित हो गया है।

पारदर्शिता सुनिश्चित करने का एक प्रयास

भाजपा सरकार ने इस फैसले को अदालत के निर्देशों के अनुरूप सामाजिक न्याय और पारदर्शिता सुनिश्चित करने का एक प्रयास बताया है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से ओबीसी समूहों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है, जिससे राज्य में आरक्षण के परिदृश्य में एक बड़ा परिवर्तन आ सकता है। उनका यह भी कहना है कि इस निर्णय से भविष्य में राज्य सरकार पर आरक्षण का एक नया और सुदृढ़ ढांचा तैयार करने का दबाव भी बढ़ सकता है।

पूर्ववर्ती तृणमूल कांग्रेस सरकार द्वारा जारी ओबीसी सूची में कुल 140 उप-समूह शामिल थे, जिन्हें ओबीसी-ए और ओबीसी-बी श्रेणियों के तहत रखा गया था। इनमें से 80 उप-समूह मुस्लिम समुदाय से संबंधित थे। हालांकि, कलकत्ता उच्च न्यायालय ने इस कदम पर रोक लगा दी थी, जिसे बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने हटा दिया था। उल्लेखनीय है कि इस महीने की शुरुआत में, विधानसभा चुनावों में भारी बहुमत हासिल करने के बाद भाजपा ने पश्चिम बंगाल में पहली बार सरकार बनाई है।

आरक्षण को लेकर राजनीतिक बहस तेज

ममता सरकार के कार्यकाल में, वर्ष 2010 के बाद जिन जातियों और समुदायों को ओबीसी यानी अन्य पिछड़ा वर्ग की सूची में जोड़ा गया था, उन्हें अब नई व्यवस्था के तहत बाहर कर दिया गया है। इन बाहर किए गए समुदायों में कई मुस्लिम समुदाय भी शामिल बताए जा रहे हैं, जिससे एक बार फिर आरक्षण को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।

नई अधिसूचना के अनुसार, अब राज्य में वही ओबीसी सूची प्रभावी होगी जो वर्ष 2010 से पहले लागू थी। इसी आधार पर सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण का लाभ प्रदान किया जाएगा। इस महत्वपूर्ण बदलाव के बाद अब केवल 66 जातियों और वर्गों को ही 7 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण का लाभ मिल पाएगा।

सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक, 2010 से पहले लागू सूची पर कभी कोई न्यायिक आपत्ति नहीं आई थी। सरकार का तर्क है कि पुरानी व्यवस्था को दोबारा लागू करने का मुख्य उद्देश्य आरक्षण प्रणाली को कानूनी रूप से मजबूत और अधिक पारदर्शी बनाना है। दरअसल, पश्चिम बंगाल में ओबीसी आरक्षण लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। 2010 से पहले ओबीसी सूची सीमित थी और उसमें उन्हीं समुदायों को शामिल किया जाता था, जिनके सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के ठोस आंकड़े मौजूद हों। साथ ही, कानूनी और प्रशासनिक जांच के बाद ही किसी जाति को सूची में जगह मिलती थी। लेकिन 2010 के बाद बड़ी संख्या में नई जातियों और समुदायों को ओबीसी सूची में जोड़ा गया। उस समय विपक्ष में रहते हुए भाजपा लगातार यह आरोप लगाती रही थी कि इनमें कई मुस्लिम समुदायों को राजनीतिक कारणों से शामिल किया गया था। अब सरकार ने स्पष्ट किया है कि नई सूची से किसी समुदाय को धार्मिक आधार पर नहीं हटाया गया है, बल्कि उन समुदायों को बाहर किया गया है जिनका समावेशन बाद में हुआ था और जिन पर अदालतों में सवाल उठे थे। यही वजह है कि 2010 के बाद ओबीसी दर्जा पाने वाले कई मुस्लिम समुदाय अब अंतिम सूची में शामिल नहीं हैं।

Ankita Chourdia
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