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जावद में ‘गांधीगिरी’: वेतन न मिलने पर हाथ में ‘माला’ लेकर सफाईकर्मियों ने संभाला मोर्चा

Reported by:Kamlesh Sarda|Edited by:Atul Saxena
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यह कटाक्ष सीधे तौर पर परिषद की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाता है। कर्मचारियों का यह तरीका बताता है कि वे आर्थिक तंगी के कारण कितने हताश हैं कि अब उन्हें विरोध के लिए व्यंग्य का सहारा लेना पड़ रहा है।
जावद में ‘गांधीगिरी’: वेतन न मिलने पर हाथ में ‘माला’ लेकर सफाईकर्मियों ने संभाला मोर्चा

Sanitation workers protest Jawad Neemuch

नीमच जिले के जावद नगर परिषद में सोमवार को एक ऐसा नजारा देखने को मिला जिसे देखकर हर कोई हैरान रह गया। परिषद कार्यालय में जहां एक ओर पार्षद दल की महत्वपूर्ण बैठक चल रही थी, वहीं दूसरी ओर कार्यालय के बाहर हाथ में फूल-मालाएं लेकर खड़े कर्मचारियों ने विरोध का एक अनोखा और ‘अजब-गजब’ तरीका अपनाया।

वेतन नहीं, पर ‘सम्मान’ की तैयारी

नगर परिषद के सफाई कर्मचारी, वाटर सप्लाई विभाग के कर्मी और कंप्यूटर ऑपरेटर पिछले लगभग 3 माह से अपने वेतन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। घर का चूल्हा जलाने के लाले पड़ रहे हैं, लेकिन प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही। ऐसे में कर्मचारियों ने नारेबाजी या हंगामे के बजाय ‘गांधीगिरी’ का रास्ता चुना।

अनोखा प्रदर्शन: “वेतन मिल रहा है, हम बहुत खुश हैं!”

जावद नगर परिषद कर्मचारी संघ के अध्यक्ष प्रहलाद बंजारा, दरोगा अनिल राडोदिया, राजु राडोदिया और संजय गेंगट के नेतृत्व में कर्मचारी मालाएं लेकर गेट पर खड़े रहे। कर्मचारियों का कहना है कि वे बैठक में जाकर पार्षदों और अधिकारियों का माला पहनाकर ‘सम्मान’ करेंगे।

कर्मचारियों ने व्यंग्य के जरिये दिखाई हकीकत 

कर्मचारियों ने व्यंग्य करते हुए कहा, हम प्रशासन को यह संदेश देना चाहते हैं कि आपकी परिषद से हमें समय पर वेतन मिल रहा है और हमारे परिवारों में खुशी की लहर है। इसी ‘खुशी’ में हम आपका स्वागत करना चाहते हैं। यह कटाक्ष सीधे तौर पर परिषद की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाता है। कर्मचारियों का यह तरीका बताता है कि वे आर्थिक तंगी के कारण कितने हताश हैं कि अब उन्हें विरोध के लिए व्यंग्य का सहारा लेना पड़ रहा है।

भीतर बैठक, बाहर भूख का सवाल

जब परिषद के भीतर शहर के विकास और आगामी योजनाओं पर चर्चा हो रही थी, ठीक उसी समय बाहर वे हाथ खड़े थे जो शहर को साफ रखते हैं और घर-घर पानी पहुँचाते हैं। 3 महीने का बकाया वेतन किसी भी कर्मचारी के लिए मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना जैसा है। अब देखना यह है कि इस ‘अनोखी गांधीगिरी’ के बाद क्या परिषद की नींद टूटती है या कर्मचारियों का यह ‘माला वाला मोर्चा’ सिर्फ एक चर्चा का विषय बनकर रह जाएगा।

Atul Saxena
लेखक के बारे में
पत्रकारिता मेरे लिए एक मिशन है, हालाँकि आज की पत्रकारिता ना ब्रह्माण्ड के पहले पत्रकार देवर्षि नारद वाली है और ना ही गणेश शंकर विद्यार्थी वाली, फिर भी मेरा ऐसा मानना है कि यदि खबर को सिर्फ खबर ही रहने दिया जाये तो ये ही सही अर्थों में पत्रकारिता है और मैं इसी मिशन पर पिछले तीन दशकों से ज्यादा समय से लगा हुआ हूँ.... पत्रकारिता के इस भौतिकवादी युग में मेरे जीवन में कई उतार चढ़ाव आये, बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ा लेकिन इसके बाद भी ना मैं डरा और ना ही अपने रास्ते से हटा ....पत्रकारिता मेरे जीवन का वो हिस्सा है जिसमें सच्ची और सही ख़बरें मेरी पहचान हैं .... View all posts by Atul Saxena
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