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चरनोई भूमि को लेकर दायर जनहित याचिका को झटका, हाई कोर्ट ने हटाई रोक,इंडस्ट्रियल कॉरिडोर परियोजना को राहत

Reported by:Kamlesh Sarda|Edited by:Atul Saxena
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कोर्ट ने दस्तावेजों के आधार पर माना कि इंडस्ट्रियल कॉरिडोर राज्य सरकार की परियोजना है और सुविधि रेयांश को किया गया भूमि आवंटन प्रथम दृष्टया वैधानिक है।
चरनोई भूमि को लेकर दायर जनहित याचिका को झटका, हाई कोर्ट ने हटाई रोक,इंडस्ट्रियल कॉरिडोर परियोजना को राहत

Indore HC

नीमच जिले की गौचर/चरनोई भूमि को लेकर दायर जनहित याचिका पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने बड़ा फैसला सुनाया है। वादी जगदीश कुमावत की ओर से दायर जनहित याचिका में कोर्ट ने 17 नवंबर 2025 को लगाया गया स्टे आदेश निरस्त कर दिया है, जिससे राज्य सरकार की इंडस्ट्रियल कॉरिडोर परियोजना को बड़ी राहत मिली है।

उल्लेखनीय है कि याचिका में आरोप था कि ग्राम के निस्तार पत्रक में दर्ज गोचर/चरनोई भूमि को मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 234 के प्रावधानों की अनदेखी कर अन्य प्रयोजनों के लिए उपयोग में लिया गया। इसी आधार पर भूमि पर रोक की मांग की गई थी। सुनवाई के दौरान राज्य शासन ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि याचिका वास्तविक जनहित में नहीं, बल्कि व्यक्तिगत हित से प्रेरित है।

शासन की ओर से न्यायालय को बताया गया कि कलेक्टर द्वारा 6 दिसंबर 2017 को धारा 237 के तहत विधिवत आदेश पारित कर उक्त भूमि को विकास एवं अधोसंरचना परियोजना हेतु डायवर्ट किया गया था। यह भूमि राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी इंडस्ट्रियल कॉरिडोर परियोजना के लिए स्वीकृत है।

शासन ने दिया ये स्पष्टीकरण 

राज्य शासन ने स्पष्ट किया कि परियोजना के लिए भूमि पहले राज्य सरकार के नाम दर्ज की गई और फिर नोडल एजेंसी एमपीआईडीसी के माध्यम से औद्योगिक इकाई स्थापना हेतु सुविधि रियांश को आवंटित की गई। यह पूरी प्रक्रिया शासन की स्वीकृति और कानून के दायरे में की गई है।

न्यायालय ने भू-राजस्व संहिता का दिया हवाला 

न्यायालय ने भू-राजस्व संहिता की धारा 237(4) का हवाला देते हुए कहा कि राज्य सरकार की स्वीकृत विकास एवं अधोसंरचना परियोजनाओं के लिए यदि गौचर भूमि का उपयोग अपरिहार्य हो तो कलेक्टर वैकल्पिक निस्तार व्यवस्था सुनिश्चित कर भूमि का विचलन कर सकता है।

निचली अदालत का आदेश को निरस्त 

कोर्ट ने दस्तावेजों के आधार पर माना कि इंडस्ट्रियल कॉरिडोर राज्य सरकार की परियोजना है और सुविधि रेयांश को किया गया भूमि आवंटन प्रथम दृष्टया वैधानिक है। इन तथ्यों के मद्देनज़र हाईकोर्ट ने स्टेटस-क्वो (स्टे) आदेश को समाप्त कर दिया। हालांकि, वादी जगदीश कुमावत को चार सप्ताह में प्रत्युत्तर दाखिल करने का अवसर दिया गया है।

Atul Saxena
लेखक के बारे में
पत्रकारिता मेरे लिए एक मिशन है, हालाँकि आज की पत्रकारिता ना ब्रह्माण्ड के पहले पत्रकार देवर्षि नारद वाली है और ना ही गणेश शंकर विद्यार्थी वाली, फिर भी मेरा ऐसा मानना है कि यदि खबर को सिर्फ खबर ही रहने दिया जाये तो ये ही सही अर्थों में पत्रकारिता है और मैं इसी मिशन पर पिछले तीन दशकों से ज्यादा समय से लगा हुआ हूँ.... पत्रकारिता के इस भौतिकवादी युग में मेरे जीवन में कई उतार चढ़ाव आये, बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ा लेकिन इसके बाद भी ना मैं डरा और ना ही अपने रास्ते से हटा ....पत्रकारिता मेरे जीवन का वो हिस्सा है जिसमें सच्ची और सही ख़बरें मेरी पहचान हैं .... View all posts by Atul Saxena
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