
Women prepare midday meals protest
जिन हाथों से सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले नौनिहालों की थाली सजती है, मंगलवार को उन्हीं हाथों में विरोध की सूखी रोटियां और सब्जियां थीं। महीनों से लंबित भुगतान और मानदेय की राह देख रहीं स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं और मध्यान्ह भोजन की रसोइयों का सब्र आखिरकार टूट गया। महिलाएं सिर पर रोटियां और हाथों में सब्जियां उठाकर कलेक्ट्रेट पहुंच गईं और जमकर नारेबाजी की। इस प्रदर्शन में पीडीएस (उचित मूल्य दुकान) विक्रेता भी अपनी मांगों को लेकर शामिल हुए।
कलेक्ट्रेट परिसर में प्रदर्शन कर रहीं महिलाओं ने प्रशासन के सामने अपनी पीड़ा रखते हुए बताया कि पिछले पांच से छह महीनों से उन्हें मध्यान्ह भोजन की राशि और मानदेय का भुगतान नहीं किया गया है। प्रदर्शनकारियों ने दावा किया कि नीमच जिले में कार्यरत करीब 2200 रसोइयों में से अब तक महज 300 को ही भुगतान मिल सका है, जबकि शेष 1900 रसोइयां अब भी अपने हक के पैसे का इंतजार कर रही हैं।
दुकानदारों ने बंद किया उधार, कैसे पकाएं भोजन?
समूह संचालक महिलाओं ने बताया कि समय पर राशि न मिलने से स्कूलों में मध्यान्ह भोजन का संचालन करना असंभव होता जा रहा है। अब तक वे स्थानीय किराना व्यापारियों से उधार में राशन, तेल, मसाले और सब्जियां खरीदकर बच्चों को भोजन परोस रही थीं, लेकिन महीनों से बकाया न चुका पाने के कारण दुकानदारों ने भी उधार देना बंद कर दिया है। महिलाओं ने सवाल उठाया कि जब घर का चूल्हा जलाना ही मुश्किल हो रहा है, तो वे अपनी जेब से स्कूलों की व्यवस्था कब तक चलाएंगी?
सरकारी खर्चों और मामूली मानदेय पर उठाए सवाल
प्रदर्शन के दौरान महिलाओं और पीडीएस विक्रेताओं ने सरकार के बड़े आयोजनों और खर्चों की तुलना रसोइयों के मामूली मानदेय से करते हुए तीखे सवाल उठाए। उनका कहना था कि सरकार करोड़ों रुपये के आयोजन कर रही है, लेकिन स्कूलों में घंटों पसीना बहाने वाली गरीब महिलाओं को उनका तय और मामूली मानदेय देने के लिए बजट का अभाव बताया जाता है। प्रदर्शनकारियों ने कलेक्ट्रेट में अधिकारियों को ज्ञापन सौंपते हुए चेतावनी दी कि यदि जल्द ही लंबित राशि का भुगतान नहीं किया गया, तो वे मध्यान्ह भोजन का काम पूरी तरह बंद कर उग्र आंदोलन के लिए बाध्य होंगी।
कमलेश सारड़ा की रिपोर्ट
पत्रकारिता में तीन दशक से अधिक का अनुभव.

