बुंदेलखंड के पन्ना जिले में केन-बेतवा लिंक, महिला और रुंझ बांध परियोजनाओं से विस्थापित हुए ग्रामीण और आदिवासी अपनी जायज मांगों को लेकर लगातार मोर्चा खोले हुए हैं।
कुंवरपुर गांव में चल रहे चिता आंदोलन के पांचवें दिन एक बेहद दुखद घटना सामने आई, जब प्रदर्शन में शामिल 80 वर्षीय बुजुर्ग रमिया आदिवासी की मौत हो गई। आंदोलन स्थल से कुछ ही दूरी पर उनका अंतिम संस्कार किया गया जहां प्रदर्शनकारियों ने दो मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी।
प्रशासन का त्वरित खंडन और मुआवजे का दावा
बुजुर्ग महिला की मौत की खबर जैसे ही सोशल मीडिया और खबरों में सामने आई, जिला प्रशासन तुरंत हरकत में आ गया। आनन-फानन में एक पत्र जारी कर प्रशासन ने इस खबर का खंडन कर दिया। सरकारी पत्र में दावा किया गया कि महिला की जान आंदोलन में शामिल होने के कारण नहीं हुई है और उनके परिवार को पूरा मुआवजा पहले ही दिया जा चुका है।
मौत सिस्टम की नाकामी से हुई
चिता आंदोलन की अगुवाई कर रहे समाजसेवी अमित भटनागर ने भी प्रशासन को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि रमिया आदिवासी की जान किसी निजी बीमारी से नहीं, बल्कि सरकारी सिस्टम में फैली लापरवाही की बीमारी से गई है। मझगवां बांध परियोजना को शुरू हुए करीब 12 साल बीत चुके हैं लेकिन एक दशक से ज्यादा समय गुजर जाने के बाद भी विस्थापितों को उनका पूरा हक न मिलना प्रशासनिक नाकामी को दर्शाता है।
पानी में उतरकर हक मांगने को मजबूर बुजुर्ग
विस्थापित ग्रामीणों का कहना है कि जिस उम्र में बुजुर्गों को घर में आराम करना चाहिए, उस उम्र में उन्हें अपनी जमीन, मकान और सही मुआवजे की खातिर पानी में उतरकर आंदोलन करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। कई पीड़ित परिवार आज भी पुनर्वास पैकेज के लिए संघर्ष कर रहे हैं। आंदोलनकारियों ने साफ कर दिया है कि जब तक हर विस्थापित को न्याय नहीं मिल जाता, तब तक यह प्रदर्शन जारी रहेगा।






