शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने शनिवार को कोटा प्रवास के दौरान मंदिरों में लागू वीआईपी दर्शन व्यवस्था पर सीधी आपत्ति जताई। उन्होंने साफ कहा कि यह व्यवस्था बंद होनी चाहिए ताकि सभी श्रद्धालुओं के साथ समान व्यवहार हो और मंदिर में कोई भेदभाव न हो। उनके इस बयान से सनातन धर्म में बढ़ रहे दिखावे और पाखंड पर बहस तेज हो गई है।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने कोटा में बड़ी संख्या में पहुंचे भक्तों से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने कई अहम मुद्दों पर अपनी राय रखी। उन्होंने विशेष रूप से गौमाता की रक्षा के लिए कोटा में हो रहे प्रयासों की सराहना की। शंकराचार्य ने बताया कि उनके द्वारा हर विधानसभा में एक गौ-धाम की स्थापना की जा रही है, और इसी सिलसिले में उनका कोटा आना जरूरी था। उन्होंने उम्मीद जताई कि गौमाता की रक्षा के लिए कोटा आगे भी ऐसे कदम उठाता रहेगा, जिनकी सराहना की जानी चाहिए।
मंदिरों में वीआईपी दर्शन पर रोक लगे: शंकराचार्य
मंदिरों में वीआईपी दर्शन को लेकर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का रुख एकदम स्पष्ट था। उन्होंने कहा कि मंदिर इसलिए बनाए जाते हैं ताकि श्रद्धालु अपने आराध्य के करीब आ सकें और उनके बीच की दूरी कम हो। दुनिया में हर जगह भेदभाव देखने को मिलता है, लेकिन मंदिर ही एक ऐसी जगह मानी जाती थी जहां सभी भक्त समान होते थे।
“आज मंदिरों में भी वीआईपी व्यवस्था लागू हो गई है। यह देखा जा रहा है कि किसके पास पैसा है और कौन बिना पैसे के आया है। हमारा मानना है कि मंदिरों में वीआईपी दर्शन बंद होने चाहिए ताकि सभी श्रद्धालुओं के साथ समान व्यवहार हो और बिना भेदभाव के दर्शन व्यवस्था सुनिश्चित की जा सके।” (शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती)
शंकराचार्य ने जोर देकर कहा कि मंदिर किसी एक वर्ग विशेष के लिए नहीं, बल्कि सभी भक्तों के लिए होते हैं। वहां धन या पद के आधार पर किसी को प्राथमिकता देना धर्म के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। उन्होंने इस व्यवस्था को खत्म कर मंदिरों को पुनः समानता का प्रतीक बनाने की अपील की।
सनातन धर्म में बढ़ रहा दिखावा और पाखंड
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने सनातन धर्म के भीतर बढ़ रहे दिखावे और पाखंड पर भी गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आज लोग धर्म का पालन कम कर रहे हैं और धार्मिक होने का दिखावा ज्यादा कर रहे हैं। इस दिखावे के चलते लोग धर्म से दूर होते जा रहे हैं, जिससे सनातन धर्म के कमजोर होने का खतरा पैदा हो रहा है।
उन्होंने बताया कि इसी वजह से उनके द्वारा यह मुहिम चलाई जा रही है, जिसका उद्देश्य ‘नकली हिंदूत्व’ को पीछे छोड़कर ‘असली धर्म’ को सामने लाना है। शंकराचार्य ने पाखंड करने वाले लोगों पर कटाक्ष करते हुए कहा कि ऐसे लोगों को उनकी बातें पसंद नहीं आती हैं। वे चाहते हैं कि जो वे कर रहे हैं, वही सही माना जाए और उन्हें कोई न रोके। उनका मानना है कि धर्म के नाम पर हो रहे इस आडंबर को रोकना बेहद जरूरी है ताकि वास्तविक आध्यात्मिकता और धार्मिकता को बल मिल सके।
मतदान प्रक्रिया पर भी उठाए सवाल, बोले- गौ-हत्या करने वालों को लगेगा पाप
चुनाव और मतदान प्रक्रिया को लेकर पूछे गए एक सवाल पर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने एक गंभीर बात कही। उन्होंने बताया कि हिंदू धर्म में कोई भी कार्य करने से पहले धर्म और अधर्म, पाप और पुण्य का विचार किया जाता है। उन्होंने कहा कि मतदान के दौरान प्रत्येक व्यक्ति को वोट देना पड़ता है, लेकिन एक हिंदू को यह सोचना चाहिए कि उसके मतदान से उसे पाप लगेगा या पुण्य।
शंकराचार्य ने समझाया कि यदि जिस व्यक्ति या पार्टी को वोट दिया गया, वह आगे चलकर गौ-हत्या जैसे कार्यों को बढ़ावा देती है, तो उसका पाप उस व्यक्ति को भी लगेगा जिसने उसे वोट देकर जिताया है। इसलिए, हर हिंदू को मतदान करते समय इस बात का गहन विचार करना चाहिए कि वह किसी पाप का भागीदार न बने। उनका यह बयान राजनीतिक गलियारों में भी नई बहस छेड़ सकता है, जहां मतदाता अपने प्रत्याशी के चयन में धार्मिक और नैतिक पहलुओं पर विचार करने के लिए मजबूर होंगे।
कुल मिलाकर, शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का कोटा प्रवास कई मायनों में महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने न केवल मंदिरों की वर्तमान व्यवस्था पर सवाल उठाए, बल्कि सनातन धर्म के आंतरिक मुद्दों और मतदान जैसे नागरिक कर्तव्यों पर भी गहन विचार करने का आह्वान किया। उनके इन बयानों से धार्मिक और सामाजिक क्षेत्रों में नई चर्चाएँ शुरू होने की उम्मीद है।






