धनतेरस से अलग है आदिवासी समाज का ‘धानतेरस’, अन्न, धरती और प्रकृति पूजा का अनूठा पर्व

सोना-चांदी, रुपया-पैसा नहीं, अन्न और प्रकृति ही असली धन हैं। आदिवासी समाज इस बात को भलीभांति समझता है। धानतेरस इसी जीवनदर्शन का उत्सव है जहां धरती को मां, अन्न को जीवन और प्रकृति को सबसे अनमोल धरोहर माना जाता है। यह पर्व हमें संदेश देता है कि सच्ची समृद्धि तिजोरियों में नहीं, बल्कि उस मिट्टी में है जो जीवन का आधार है।
Dhanteras

Dhanteras

आज देशभर में धनतेरस का पर्व हर्षोल्लास से मनाया जा रहा है। जहां मुख्यधारा में यह पर्व सोना-चांदी, बर्तन और लक्ष्मी-कुबेर पूजा से जुड़ा है, वहीं आदिवासी समाज इसे पूरी तरह अलग अर्थ और परंपरा के साथ मनाता है। आदिवासी समुदाय इसे “धानतेरस” के रूप में मनाता है। इसे “अन्न तेरस” भी कहा जाता है। यह पर्व सोने-चांदी की पूजा नहीं, बल्कि धरती के अन्न, प्रकृति और जीवन के मूल आधार के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है।

मध्यप्रदेश के आदिवासी अंचलों में विशेषकर भील और भीलाला समुदाय के बीच इसी अवसर पर “धानतेरस” मनाने की अनूठी परंपरा है। आदिवासी समाज की समृद्ध लोकसंस्कृति, कृषि परंपराओं और प्रकृति से अटूट जुड़ाव को दर्शाने वाला यह पर्व पीढ़ियों से सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा रहा है।

धानतेरस: नई फसल की खुशी और प्रकृति के प्रति आभार का पर्व

आदिवासी भील, गोंड और अन्य जनजातीय समुदायों में धानतेरस खरीफ की फसल (खासकर धान) की कटाई के बाद की खुशी का पर्व है। सदियों से आदिवासी समाज प्रकृति पूजक रहा है। वे मूर्तिपूजा की बजाय धान, कोदो, कुटकी, मक्का, सब्जियां और जंगल से प्राप्त अन्न को थाली में सजाकर अन्न देवता, धरती माता और कुल देवताओं की पूजा करते हैं।

धानतेरस के दिन आदिवासी समाज “हे धरती..तूने जीवन दिया, हम तेरा सम्मान करते हैं” कहकर धरती और प्रकृति के प्रति अपना सम्मान व्यक्त करते हैं। आदिवासी समाज के लिए असली धन सोना-चांदी नहीं, बल्कि धरती का अन्न है। यही अनाज हर जीव के जीवन का आधार है। इसलिए वे इसे “कणि याहा”, “धान देवी पूजा”, “थान मातो” या “कणि कंसारी तिहार” जैसे नामों से भी पुकारते हैं।

खेत, खलिहान और पगडंडियों पर जलाते हैं दीपक

भील आदिवासी समाज की दीपावली परंपरा में दीप प्रज्ज्वलन का स्वरूप भी विशिष्ट है। यहां घर की चौखट के साथ खेतों, कुओं, खलिहानों और पशुओं को बांधने के स्थानों पर दीपक जलाए जाते हैं। खेतों तक पहुंचने वाली पगडंडियों पर भी दीप प्रज्ज्वलित करने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। यह परंपरा खेती, पशुधन और प्रकृति के साथ आदिवासी जीवन के गहरे संबंध को दर्शाती है। इस अवसर पर धरती, चांद, सूरज और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है। खेती में इस्तेमाल होने वाले औजारों और पारंपरिक हथियारों का भी सांस्कृतिक महत्व है।

पूर्वजों को अर्पित करते हैं पारंपरिक पकवान

धानतेरस के अवसर पर पारंपरिक पकवान तैयार करने और उन्हें पूर्वजों को अर्पित करने की भी परंपरा रही है। स्थानीय रीति-रिवाजों के अनुसार भोजन तैयार होने के बाद घर के पारंपरिक पवित्र स्थान पर महुए के रस की धार अर्पित कर पूर्वजों का स्मरण किया जाता है। इसके बाद परिवार और मेहमान सामूहिक रूप से भोजन ग्रहण करते हैं। पारंपरिक खानपान में गेहूं के आटे से बनने वाले ताये, वड़े, पकौड़े और मिर्ची बड़े जैसे व्यंजन शामिल रहे हैं। समय के साथ खानपान में बदलाव आया है और कई जगह पारंपरिक पकवानों के साथ खीर, पूरी तथा अन्य मिठाइयों का चलन भी बढ़ा है।

मिट्टी के धाबे और टेराकोटा घोड़ों की परंपरा

मध्य प्रदेश के झाबुआ और आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले भील और भीलाला समुदायों की दीपावली से जुड़ी एक अन्य विशिष्ट परंपरा मिट्टी के धाबे और टेराकोटा के घोड़ों से संबंधित है। मिट्टी से बने छोटे पूजा-स्थल और घोड़े तैयार कर उन्हें ग्राम देवस्थानों पर अर्पित किया जाता है। यह परंपरा स्थानीय देवी-देवताओं के प्रति आस्था और लोकविश्वासों को अभिव्यक्त करती है।

उमंग सिंघार ने दी धानतेरस की शुभकामनाएं

मध्यप्रदेश के नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने आदिवासी समाज के पारंपरिक पर्व धानतेरस पर शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने कहा कि “आदिवासी समाज की समृद्ध परंपराओं, संस्कृति और प्रकृति से अटूट जुड़ाव के प्रतीक पावन पर्व धानतेरस की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं एवं जोहार।” कांग्रेस नेता ने कामना की कि यह पर्व सभी के जीवन में सुख, समृद्धि, खुशहाली और नई ऊर्जा लेकर आए। हमारी लोकपरंपराएं और सांस्कृतिक विरासत सदैव समृद्ध होती रहें। उन्होंने जय जोहार और जय आदिवासी का संदेश भी दिया।

Shruty Kushwaha
लेखक के बारे में
Shruty Kushwaha

पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (M.J.), 2001. 2001 से 2013 तक ईटीवी हैदराबाद, सहारा न्यूज दिल्ली-भोपाल और लाइव इंडिया मुंबई में कार्य.

2001 में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (M.J, Masters of Journalism)। 2001 से 2013 तक ईटीवी हैदराबाद, सहारा न्यूज दिल्ली-भोपाल, लाइव इंडिया मुंबई में कार्य अनुभव। साहित्य पठन-पाठन में विशेष रूचि। View all posts by Shruty Kushwaha →
Follow Us :GoogleNews