कोरोना के अवसाद भरे दौर में पढ़िये शुभम नानू की उम्मीद भरी कविता

कोरोना के अवसाद भरे दौर में पढ़िये शुभम नानू की उम्मीद भरी कविता

सीहोर/अनुराग शर्मा

कोरोना संकटकाल ने सारी दुनिया को एक ऐसे दौर में ला दिया हैै, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। ऐसे समय में शासन-प्रशासन, डॉक्टर, पैरामेडिकल स्टाफ, सफाईकर्मी सहित कई ऐसे लोग हैैं जो अपनी जान जोखिम में डालकर मानवता की सेवा कर रहे हैं। वहीं ऐसे समय में कलाकाल, रचनाधर्मी और साहित्यकार भी अपनी कला व शब्दों के माध्यम से समय को दर्ज कर रहे हैं। आईये आज ऐसी ही एक कविता पढ़ते हैं जो लिखी है शुभम नानू ने-

“इस कठिन दौर में इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है”- शुभम नानू की कविता

यह वह दौर है जो हमने कभी नहीं सोचा यह वह दौर है जो हम कभी सोचना नहीं चाहते

यह वह दौर है जो हमें अनगिनत सीख दे रहा है, यह वह दौर है जब वक्त थम गया है यह

वह दौर है जब इंसान इंसान से डर रहा है
यह वह दौर है जब इंसान घरों में कैद है यह वह दौर है जब हर जगह सन्नाटा पसरा है

यह वह दौर है जब इंसान बेहद असहाय हैं हां यह वह दौर है जब इंसान के कई चेहरे देखने को मिल रहे हैं

कहीं मदद के हाथ आगे आ रहे हैं कहीं खौफ का मंजर ऐसा है कि लोग पत्थर बरसा रहे हैं

हां कुछ फरिश्ते बैंक में दवाखानों पुलिस चौकी कुछ कैमरा और माइक पर कोई शहर की सफाई पर जान का जोखिम लिए मौत से दो दो हाथ कर रहे है

मंदिर मस्जिद और चर्च बंद है सारे ईश्वर के घर, क्या हम लड़ जाएंगे मिलजुल कर

हां हम जीत जाएंगे मिलजुल कर, हां ! हम हैं वही दौर पर। जब मध्यम दौलत और गरीब हैं एक ही छोर पर

इंसान अब करें तो क्या , अब कहां यह वह दौर है देखो अब कैद है अपने घरों में, जैसे होते पक्षी कैद पर

चलो छोड़ो धर्म की बातें कुछ पल इंसान बने ।

इंसान हैं इंसानियत की बात करें।

चलो मिलकर ईश्वर अल्लाह को याद करें, पर भूले ना नियमों का पालन करें घर के बाहर दानव है खड़ाचलो घर में ही रह कर उस पर वार करें ।

Gaurav Sharma
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निदेशक और संपादक

पत्रकारिता पेशा नहीं ज़िम्मेदारी है और जब बात ज़िम्मेदारी की होती है तब ईमानदारी और जवाबदारी से दूरी बनाना असंभव हो जाता है। एक पत्रकार की जवाबदारी समाज के लिए उतनी ही आवश्यक होती है जितनी परिवार के लिए क्यूंकि समाज का हर वर्ग हर शख्स पत्रकार पर आंख बंद कर उस तरह ही भरोसा करता है जितना एक परिवार का सदस्य करता है। पत्रकारिता मनुष्य को समाज के हर परिवेश हर घटनाक्रम से अवगत कराती है, यह इतनी व्यापक है कि जीवन का कोई भी पक्ष इससे अछूता नहीं है। यह समाज की विकृतियों का पर्दाफाश कर उन्हे नष्ट करने में हर वर्ग की मदद करती है। इसलिए पं. कमलापति त्रिपाठी ने लिखा है कि," ज्ञान और विज्ञान, दर्शन और साहित्य, कला और कारीगरी, राजनीति और अर्थनीति, समाजशास्त्र और इतिहास, संघर्ष तथा क्रांति, उत्थान और पतन, निर्माण और विनाश, प्रगति और दुर्गति के छोटे-बड़े प्रवाहों को प्रतिबिंबित करने में पत्रकारिता के समान दूसरा कौन सफल हो सकता है। View all posts by Gaurav Sharma →
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