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पहले आवेदन खारिज, फिर 14-15 साल पुराने जन्म-मृत्यु के पंजीयन को मंजूरी, माड़ा तहसील के दो फैसलों पर सवाल

2012 के जन्म और 2011 की मृत्यु का मामला, पहले आवेदन हुए अस्वीकार, बाद में तहसीलदार अमित कुमार मिश्रा ने जारी किए पंजीयन आदेश
Singrauli Collectorate

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माड़ा तहसील में जन्म और मृत्यु के दो पुराने मामलों में पहले आवेदन खारिज करने और बाद में पंजीयन की अनुमति देने का मामला सामने आया है। दोनों प्रकरणों में घटनाएं एक दशक से भी ज्यादा पुरानी हैं। एक में जन्म वर्ष 2012 का है, जबकि दूसरे में मृत्यु वर्ष 2011 की है। बाद में दोनों के पंजीयन के आदेश 8 जुलाई 2026 को तहसीलदार अमित कुमार मिश्रा ने जारी किए। अब सवाल इसी बात पर है कि पहले अस्वीकार किए गए इन प्रकरणों में बाद में अनुमति देने का आधार क्या रहा?

पहला मामला अमन सिंह का है, जिनकी जन्मतिथि 1 जुलाई 2012 दर्ज है। इनके जन्म के पंजीयन के लिए देरी से आवेदन किया गया, जिसे कार्यपालिक मजिस्ट्रेट स्तर पर पहले अस्वीकार कर दिया गया। इसके बाद 8 जुलाई को तहसीलदार अमित कुमार मिश्रा ने आदेश जारी करते हुए रजिस्ट्रार/उप रजिस्ट्रार को जन्म रजिस्टर में उनका जन्म दर्ज करने के निर्देश दे दिए।

दूसरा मामला मोहन सिंह का है। उनकी मृत्यु 7 अक्टूबर 2011 को होना बताई गई है। इस प्रकरण में भी देरी से मृत्यु पंजीयन के लिए दिया गया आवेदन पहले अस्वीकार हुआ, लेकिन बाद में तहसीलदार ने 8 जुलाई को मृत्यु पंजीयन की अनुमति देते हुए इसे मृत्यु रजिस्टर में दर्ज करने का आदेश जारी कर दिया।

इतने साल बाद पंजीयन नहीं, फैसले का बदलना है सवाल

किसी जन्म या मृत्यु का वर्षों बाद पंजीयन होना अपने आप में अनियमितता साबित नहीं करता। देरी से पंजीयन के लिए कानूनी प्रक्रिया मौजूद है। लेकिन माड़ा के इन मामलों में सवाल अवधि से ज्यादा पहले आवेदन खारिज होने और फिर अनुमति मिलने को लेकर है, जो शंका पैदा करते हैं।

यदि पहले प्रस्तुत दस्तावेज या साक्ष्य पर्याप्त नहीं थे तो बाद में क्या नए तथ्य सामने आए? क्या नए सिरे से आवेदन और जांच हुई? पहले की अस्वीकृति के बाद पंजीयन की अनुमति देने के लिए कौन-सी प्रक्रिया अपनाई गई? यही वे सवाल हैं जिनका जवाब पूरे मामले की स्थिति साफ कर सकता है।

तहसीलदार का जवाब- इससे किसी को समस्या नहीं होनी चाहिए

मामले में तहसीलदार अमित कुमार मिश्रा से सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि इससे किसी को कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। हालांकि दो अलग-अलग प्रकरणों में पहले अस्वीकृति और बाद में पंजीयन की अनुमति के पीछे की प्रक्रिया को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी।

जन्म और मृत्यु का रिकॉर्ड महज एक प्रमाण पत्र तक सीमित नहीं होता। इनका उपयोग उत्तराधिकार, संपत्ति सहित कई कानूनी और सरकारी प्रक्रियाओं में किया जाता है। इसलिए मामला केवल दो पुराने पंजीयन का नहीं, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड में किसी एंट्री को मंजूरी देने की प्रक्रिया और उसकी पारदर्शिता का भी है।

अब गेंद जिला प्रशासन के पाले में है। यदि दोनों आदेश नियमानुसार और पर्याप्त दस्तावेजों के आधार पर हुए हैं तो प्रशासन के लिए स्थिति स्पष्ट करना मुश्किल नहीं होना चाहिए। और यदि पहले आवेदन खारिज होने के बाद परिस्थितियां बदली थीं, तो यह भी सामने आना चाहिए कि आखिर ऐसा क्या बदला कि जिन प्रकरणों को पहले मंजूरी नहीं मिली, बाद में उन्हीं के पंजीयन का रास्ता खुल गया?

Atul Saxena
लेखक के बारे में
पत्रकारिता मेरे लिए एक मिशन है, हालाँकि आज की पत्रकारिता ना ब्रह्माण्ड के पहले पत्रकार देवर्षि नारद वाली है और ना ही गणेश शंकर विद्यार्थी वाली, फिर भी मेरा ऐसा मानना है कि यदि खबर को सिर्फ खबर ही रहने दिया जाये तो ये ही सही अर्थों में पत्रकारिता है और मैं इसी मिशन पर पिछले तीन दशकों से ज्यादा समय से लगा हुआ हूँ.... पत्रकारिता के इस भौतिकवादी युग में मेरे जीवन में कई उतार चढ़ाव आये, बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ा लेकिन इसके बाद भी ना मैं डरा और ना ही अपने रास्ते से हटा ....पत्रकारिता मेरे जीवन का वो हिस्सा है जिसमें सच्ची और सही ख़बरें मेरी पहचान हैं .... View all posts by Atul Saxena
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