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न आग, न मशाल… MP के इस शहर में बंदूक की गोली से जलती है होलिका, जानिए कैसे बनी यह परंपरा

Written by:Bhawna Choubey
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मध्य प्रदेश के सिरोंज में होलिका दहन की परंपरा सबसे अलग है। यहां होलिका आग से नहीं, बल्कि बंदूक की गोली की चिंगारी से जलाई जाती है। होल्कर रियासत से जुड़ी यह अनोखी परंपरा आज भी पूरी सुरक्षा और श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।
न आग, न मशाल… MP के इस शहर में बंदूक की गोली से जलती है होलिका, जानिए कैसे बनी यह परंपरा

होली का नाम सुनते ही रंग, गुलाल और होलिका दहन की तस्वीर सामने आ जाती है। आमतौर पर लोग लकड़ी और उपलों के ढेर में आग लगाकर होलिका जलाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि होलिका को बंदूक की गोली से जलाया जाता हो?

मध्य प्रदेश के एक छोटे से शहर में आज भी यह अनोखी परंपरा जिंदा है। यह शहर है सिरोंज, जो विदिशा जिले में स्थित है। यहां होलिका दहन बंदूक की गोली की चिंगारी से किया जाता है। सैकड़ों साल पुरानी यह परंपरा आज भी पूरे जोश और सुरक्षा व्यवस्था के साथ निभाई जाती है।

सिरोंज में बंदूक की गोली से होलिका दहन की परंपरा

सिरोंज के पचकुइया क्षेत्र में स्थित होलिका चबूतरा हर साल होली की रात एक खास वजह से चर्चा में रहता है। यहां बड़ी होलिका सजाई जाती है। सूखी घास, लकड़ी और कपास का ढेर लगाया जाता है।

फिर एक खास समय पर बंदूक से गोली चलाई जाती है। गोली की चिंगारी से होलिका में आग लगती है। यही आग बाद में शहर के अलग-अलग हिस्सों में ले जाई जाती है और वहां की छोटी होलिकाएं उसी अग्नि से प्रज्वलित की जाती हैं। सिरोंज में होलिका दहन की यह परंपरा लोगों के लिए सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि शौर्य और आस्था का प्रतीक है। बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक इस पल का इंतजार करते हैं।

होल्कर रियासत से जुड़ा इतिहास

कहा जाता है कि यह परंपरा होल्कर रियासत के समय शुरू हुई थी। उस दौर में इसे ‘रावजी की होली’ कहा जाता था। उस समय भी सूखी घास और लकड़ी के ढेर पर गोली चलाकर ही आग लगाई जाती थी।

बाद में जब नवाबी शासन आया तो इस परंपरा को रोकने की कोशिश की गई। लेकिन स्थानीय माथुर परिवार ने इसका विरोध किया। उन्होंने परंपरा को जारी रखने के लिए फिर से घास के ढेर पर गोली दागी और होलिका जलाई। तभी से यह परंपरा सिरोंज की पहचान बन गई। सिरोंज में बंदूक की गोली से होलिका दहन आज भी उसी ऐतिहासिक अंदाज में होता है।

माथुर परिवार निभा रहा है पीढ़ियों से जिम्मेदारी

इस अनोखी परंपरा को सिरोंज का माथुर परिवार पीढ़ियों से निभा रहा है। होलिका दहन की शुरुआत पूजा से होती है। परिवार के गुरु लल्लीकांत शर्मा विधि-विधान से पूजा कराते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, मौजूदा विधायक उमाकांत शर्मा भी इस परंपरा से जुड़े हुए हैं और इसका समर्थन करते हैं। माथुर परिवार का कहना है कि यह सिर्फ एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं है, बल्कि उनके पूर्वजों की विरासत है। वे इसे पूरी श्रद्धा और सावधानी के साथ निभाते हैं।

प्रशासन की सख्त निगरानी में होता है आयोजन

बंदूक से होलिका दहन होने के कारण सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता होती है। हर साल प्रशासन की कड़ी निगरानी में यह कार्यक्रम आयोजित किया जाता है।
सिरोंज के एसडीएम हरिशंकर विश्वकर्मा के अनुसार, कार्यक्रम स्थल पर पुलिस बल तैनात रहता है। गोली चलाने की प्रक्रिया पूरी सावधानी से की जाती है। भीड़ को सुरक्षित दूरी पर रखा जाता है। सिरोंज में होलिका दहन के दौरान किसी तरह की दुर्घटना न हो, इसके लिए पहले से तैयारी की जाती है।

 

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Bhawna Choubey
लेखक के बारे में
मुझे लगता है कि कलम में बहुत ताकत होती है और खबरें हमेशा सच सामने लाती हैं। इसी सच्चाई को सीखने और समझने के लिए मैं रोज़ाना पत्रकारिता के नए पहलुओं को सीखती हूँ। View all posts by Bhawna Choubey
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