राजधानी में झुंड में निकले गरीब बस्ती के लोग, कहा- “कोरोना से नहीं भूख से मर जाएंगे”

राजधानी में झुंड में निकले गरीब बस्ती के लोग, कहा- “कोरोना से नहीं भूख से मर जाएंगे”

भोपाल

राजधानी भोपाल में कोरोना वायरस तेजी से बढ़ रहा है, जिसे देखते हुए लोगों को घरों में रहने और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने के लिए लगातार प्रशासन की तरफ कहा जा रहा है। लेकिन गरीब बस्तियों में रहने वाले लोगों के सामने इस लॉकडाउन में कोरोना से बचाव के साथ भोजन जुटाना भी बड़ी चुनौती है। रोज कमाने रोज खाने वाले लोगों के लिये ये बहुत मुश्किल भरा समय हैै, ऐसे में गुरूवार को लोग बड़ी तादाद में घर से बाहर निकल आएं।

राजधानी के राहुल नगर की झुग्गी बस्ती के लोग अचानक सड़कों पर उतर आए, इनका कहना था कि हम अपने घरों में भूख से मर रहे हैं लेकिन सरकार कुछ नहीं कर रही है। इनका आरोप है कि इन्हें कंट्रोल से भी अनाज नही मिल रहा है और कंट्रोल दुकान वाले इनसे अभद्र व्यवहार भी करते हैं। अगर वहां राशन मिलता भी है तो उसमें गेहूं चावल खराब मिल रहे हैं। अगर इसकी शिकायत करो तो दुकानदार बोलते हैं कि लेना है तो लो नहीं तो   छोड़ जाओ। ताज्जुब की बात है लोगों के राशन के लिए प्रशासन की तरफ से भी कोई खास व्यवस्था नही हुई है जिस कारण इस तरह लोगों को सड़कों पर झुंड की तरह निकलने को मजबूर होना पड़ा। कोरोना संकटकाल में गरीब लोगों के लिये तो ये मुश्किल भरा समय है ही, लेकिन अगर प्रशासन ने इनके लिये कोई व्यवस्था नहीं की तो इनके इस तरह सोशल डिस्टेंस की अवहेलना से कोरोना के और फैलने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।

Gaurav Sharma
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निदेशक और संपादक

पत्रकारिता पेशा नहीं ज़िम्मेदारी है और जब बात ज़िम्मेदारी की होती है तब ईमानदारी और जवाबदारी से दूरी बनाना असंभव हो जाता है। एक पत्रकार की जवाबदारी समाज के लिए उतनी ही आवश्यक होती है जितनी परिवार के लिए क्यूंकि समाज का हर वर्ग हर शख्स पत्रकार पर आंख बंद कर उस तरह ही भरोसा करता है जितना एक परिवार का सदस्य करता है। पत्रकारिता मनुष्य को समाज के हर परिवेश हर घटनाक्रम से अवगत कराती है, यह इतनी व्यापक है कि जीवन का कोई भी पक्ष इससे अछूता नहीं है। यह समाज की विकृतियों का पर्दाफाश कर उन्हे नष्ट करने में हर वर्ग की मदद करती है। इसलिए पं. कमलापति त्रिपाठी ने लिखा है कि," ज्ञान और विज्ञान, दर्शन और साहित्य, कला और कारीगरी, राजनीति और अर्थनीति, समाजशास्त्र और इतिहास, संघर्ष तथा क्रांति, उत्थान और पतन, निर्माण और विनाश, प्रगति और दुर्गति के छोटे-बड़े प्रवाहों को प्रतिबिंबित करने में पत्रकारिता के समान दूसरा कौन सफल हो सकता है। View all posts by Gaurav Sharma →
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