पिछले कुछ सालों से राजनीति से जुड़े लोगों द्वारा देश की संसद और कुछ राज्यों की विधानसभाओं में सांसदों और विधायकों को भारत के संविधान हाथ में लिए देखा होगा, इस संविधान का हवाला देकर नेताओं ने अपनी बात रखी लेकिन एमपी के दमोह जिले से कुछ अलग तस्वीरें सामने आई है जब एक दूल्हा घोड़े पर सवार होकर गांव में निकला और उसके हाथों में भारत के संविधान की किताब थी और ये देखकर लोगों को आश्चर्य हुआ। आपको भी पढ़कर अचरज हुआ होगा..बताते हैं इसके पीछे की वजह…
दरअसल पूरा मामला दमोह जिले के हटा थाना क्षेत्र के कुआंखेड़ा महदेला गांव का है। इस गांव में आज भी परम्परा है कि दलित वर्ग के लोग शादी में बारात और रछवाई में घोड़े पर सवार नहीं हो सकते और घोड़ी पर सवार दूल्हा बारात नहीं निकाल सकता। इस परंपरा को दशकों से इस गांव के लोग मनाते चले आ रहे हैं लेकिन इस गांव के नन्दू बंसल इस परंपरा को तोड़ना चाहता था और उसकी ख्वाइश थी कि वो भी घोड़ी पर सवार होकर गांव में निकले, पहली बार इस वर्ग के किसी युवा ने ऐसा सोचा और फिर उसके परिजनों ने एसपी को ज्ञापन देकर ये मांग की कि दूल्हे को घोड़ी पर सवार होने के लिए सुरक्षा प्रदान की जाए।
सभी समाज के लोग बोले उन्हें कोई आपत्ति नहीं
दमोह एसपी और कलेक्टर को मिले इस ज्ञापन के बाद प्रशासन हरकत में आया और एक टीम तहसीलदार के नेतृत्वमें गांव में पहुंची और दलित वर्ग के अलावा अन्य जातियों के लोगों से इस मामले में बात की गई और तमाम लोगों ने ऐसी किसी पाबन्दी से इंकार कर दिया लोगों ने कहा कि जो भी जिस जाति का व्यक्ति घोड़ी पर सवार होकर बारात निकालना चाहे निकाल सकता है किसी को कोई आपत्ति नहीं और प्रशासन ने राहत की सांस ली।
पुलिस और प्रशासन की मौजूदगी में निकली बारात
पांच फरवरी को नंदू की बारात और रछवाई निकलनी थी और लोगों ने किसी भी तरह की आपत्ति नहीं ली लेकिन फिर भी पुलिस अधिकारी कोई कोताही नहीं बरतना चाहते थे लिहाजा गांव में पुलिस बल तैनात किया गया और फिर एक अलग ही नजारा देखने को मिला जब बड़ी संख्या में लोग बैंड बाजों और डीजे को धुन पर नाचते दिखाई दिए तो घोड़ी पर बैठे दूल्हे के हाथ में भारत के संविधान की किताब थी जो कई तरह के संदेश दे रही थी।
हाथ में संविधान लेकर घोड़ी पर चढ़ा दूल्हा, गाँव में घूमी बारात
दलित समाज के लोगों के मुताबिक आजादी के बाद पहली बार दलित वर्ग का कोई दूल्हा घोड़ी पर सवार हुआ है और इसके पीछे उन्होंने संविधान को ही अहम माना कि संविधान में दिए गए समता समानता के अधिकार की बदौलत यहां नया इतिहास रचा गया। फिलहाल किसी घटना को लेकर आशंकित दलित वर्ग के लोगों ने भी राहत की सांस ली कि कहीं किसी ने भी इस बात का विरोध नहीं किया।
संदेश, जाति से ऊपर उठकर समानता की बात करनी चाहिए
इस मामले में दलित वर्ग लोगों का कहना है कि बाबा साहब के संविधान की बदौलत ये मिथक टूटा है और आशा है कि आने वाले दिनों में इस वर्ग के लिए कोई दिक्कत नहीं होगी। दलित वर्ग के युवा भी कह रहे हैं अब जाति की बात से ऊपर उठकर समानता की बात करनी चाहिए संविधान में भी यही बात कही गई है, तहसीलदार उमेश तिवारी ने भी कहा कि परंपरा के नाम पर मिथक था किसी भी समाज ने कोई विरोध नहीं किया, आराम से बारात निकली और शादी भी हुई।
इस पहल ने आजादी से पहले से चली आ रही रुढ़िवादी सोच को बदल दिया
बहरहाल संविधान में दिए समानता के अधिकार को मानकर एक दलित दूल्हे ने ना सिर्फ पहल की और घोड़े पर बैठकर गांव में अपनी बारात घुमाई जो इस बात का प्रमाण है कि परम्पराओं और मिथकों के आधार समाज को बांटने की कोशिश कोई कितनी भी कर ले लेकिन आज के दौर के युवा और पुरानी पीढ़ी सामंजस्य के साथ न सिर्फ भारत के संविधान को मानती है बल्कि रूढ़िवादिता को तोड़कर आगे बढ़ने एक प्रयास भी करती है जिससे समाजों के बीच आपसी भाईचारा बना रहे।





