
आज हिंदी सिनेमा के सबसे सम्मानित गीतकारों और लेखकों में जावेद अख्तर का नाम गिना जाता है। उनकी कलम ने ‘दीवार’ जैसी कड़वी हकीकतें और ‘शोले’ जैसा क्लासिक क्लट रचा। इसके अलावा, ‘कल हो ना हो’ और ‘एक प्यार का नगमा है’ जैसे गीतों में जिंदगी के दर्पण को उतारा, लेकिन सफलता के इन चमकते पन्नों के पीछे एक ऐसा संघर्ष छिपा है, जिसे सुनकर हर कोई प्रेरित हो सकता है। कभी जिनके पास रहने की जगह तक नहीं थी, वही आज फिल्म जगत के सबसे चर्चित और सम्मानित नामों में शुमार हैं।
कहते हैं मन में कुछ करने की अभिलाषा हो, तो पूरी कायनात भी उसे एक करने में जुट जाती है। मेहनत की राह पर चलने वाला व्यक्ति लोगों से असफलताओं के लिए ठोकर खा सकता है, लेकिन कभी हार नहीं मानता और एक दिन वह उस मुकाम तक पहुंचता है, जहां हर ओर उसके दुश्मन भी चाहने वालों के लिस्ट में शामिल हो जाते हैं।
ऐसे चमकी किस्मत
ऐसा ही कुछ हुआ जावेद अख्तर के साथ… यूं तो हम सभी आए दिन बॉलीवुड में सितारों के संघर्ष की कहानी सुनते आ रहे हैं। यह एक ऐसा प्लेटफार्म है, जहां किसी की किस्मत जल्दी चमक जाती है, तो किसी को लंबा अर्सा लग जाता है। हालांकि, देर से ही सही पर सफलता जरूर मिलती है। कई बार ऐसा भी सुनने को मिला है कि कुछ कलाकार ऐसे भी रहे हैं, जो सफलता की सीढ़ियों पर चढ़कर भी असफलता प्राप्त किए, जिसके परिणामस्वरुप वह कर्जे में डूब गए। किसी का घर, गाड़ी, बंग्ला तक बिक चुका है, लेकिन जावेद अख्तर के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ है। उनकी कहानी हर किसी से हटकर थोड़ी अलग है, जिसे उन्होंने खुद ही याद किया है।
पोस्ट किया शेयर
दरअसल, उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर पोस्ट शेयर करते हुए लिखा, 4 अक्टूबर 1964… यही वो तारीख है, जब 19 साल का एक नौजवान अपनी आंखों में बड़े सपने लिए बॉम्बे सेंट्रल स्टेशन पर उतरा था। जेब में थे सिर्फ 27 पैसे, न कोई ठिकाना, न जान-पहचान। वो लड़का था जावेद अख्तर। दिल्ली और भोपाल के बीच पले-बढ़े जावेद के लिए मुंबई किसी जंग से कम नहीं थी। बेघर, भूखा और बेरोजगार था, लेकिन जिंदगी ने आखिरकार मुझ पर मेहरबानी की।”
On 4th October 1964 a 19 year old boy had disembarked at Bombay central station with 27 naya paisa in his pocket . Went through homelessness , starvation , unemployment but when I look at the grand total i feel life has been too kind to me . For that I can not but help but thank…
— Javed Akhtar (@Javedakhtarjadu) October 4, 2025
हालात से नहीं मानी हार
यह पोस्ट उस इंसान के जज्बे को बयां करती हैं, जिसने कभी हालात के आगे हार नहीं मानी। बता दें कि मुंबई आने के बाद जावेद अख्तर ने कई रातें फुटपाथ पर गुजारी थीं। कभी दोस्त के घर, कभी किसी फिल्म स्टूडियो के बाहर बस उम्मीद थी कि कोई मौका मिले। फिल्मों में शुरुआत उन्होंने बतौर डायलॉग असिस्टेंट से की। छोटे-मोटे काम करते हुए उन्होंने फिल्मी दुनिया की भाषा, उसकी चाल और उसके सपनों को करीब से समझा, लेकिन उनके जीवन में असली मोड़ तब आया, जब उनकी मुलाकात सलीम खान से हुई।
सलीम-जावेद की दमदार जोड़ी
सलीम खान और जावेद अख्तर की जोड़ी ने 70 के दशक में हिंदी सिनेमा की परिभाषा ही बदल दी थी। दोनों ने मिलकर ऐसी कहानियां लिखीं, जो आम आदमी के गुस्से, सपनों और संघर्ष को बड़े पर्दे पर ले आई। ‘हाथी मेरे साथी’ से शुरुआत करने वाली यह जोड़ी जल्द ही ‘अंदाज’, ‘सीता और गीता’, ‘जंजीर’, ‘दीवार’ और ‘शोले’ जैसी फिल्मों के जरिए बॉलीवुड में छा गई। वहीं, राजेश खन्ना पहले ऐसे अभिनेता थे, जिन्होंने किसी पटकथा लेखक को ऑन-स्क्रीन क्रेडिट देने की पहल की।
गीतों को बनाया यादगार
वहीं, अमिताभ बच्चन के करियर में ‘जंजीर’ जैसी फिल्म ने नया मोड़ दिया, जिसके पीछे सलीम-जावेद की कलम थी। लेखक के रूप में पहचान मिलने के बाद जावेद अख्तर ने गीतकार के तौर पर भी अपनी अलग दुनिया बसाई। उनकी कविताओं और गीतों में जिंदगी की सच्चाई, मोहब्बत की गहराई और समाज की तस्वीर झलकती है। “संध्या के बाद आएगी सुबह”, “जीने के हैं चार दिन” से लेकर “सुनो ना” और “तेरे लिए” जैसे गीत आज भी लोगों के दिलों में बसे हैं।
नहीं भूले दिन
सफलता के शिखर पर पहुंचने के बाद भी जावेद अख्तर अपने संघर्ष के दिनों को नहीं भूले। उन्होंने हाल ही में लिखा, “जब मैं अपने जीवन को देखता हूं, तो लगता है जिंदगी ने मुझ पर बहुत मेहरबानी की। मुंबई, महाराष्ट्र, और अपने देश का मैं शुक्रगुजार हूं।” फुटपाथ से लेकर फिल्मफेयर तक का उनका सफर ऐसा है कि किस्मत पर यकीन हो ही जाए। दरअसल, लक भी उन्हीं के साथ चलती है जो हार मानने से इनकार करते हैं।
सीनियर कंटेंट राइटर · डिप्लोमा इन मास कम्युनिकेशन, बीए. 2022 से MP Breaking News में; पहले लाइव इंडिया, VIP News Channel और Khabar Bharat में कार्य.

