
Neemuch police arrested opium smugglers
नीमच जिले के जावद विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले रतनगढ़ थाने की पुलिस एक बार फिर अफीम तस्करी के मामले में अपनी कार्यप्रणाली को लेकर सवालों के घेरे में आ गई है। तस्करों पर शिकंजा कसने का दावा करने वाली खाकी पर ही अब अफीम की मात्रा कम दिखाने, 90 लाख रुपये का कथित ‘तोड़-बट्टा’ (सौदेबाजी) करने और एक आरोपी को मौके से छोड़ने जैसे संगीन आरोप लग रहे हैं।
मामला 2 नवंबर की पुलिस कार्रवाई से जुड़ा है। रतनगढ़ पुलिस द्वारा जारी किए गए आधिकारिक प्रेस नोट के अनुसार, कार्रवाई के दौरान 6 किलो 182 ग्राम अवैध अफीम जब्त की गई है। लेकिन विश्वसनीय सूत्रों का दावा है कि मौके से करीब 15 किलो अफीम पकड़ी गई थी। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर बाकी बची करीब 9 किलो अफीम कहां गायब हो गई और इसका हिसाब-किताब किसने किया?
एक को छोड़ा, दूसरे को 4 दिन बाद भेजा जेल
सूत्रों के मुताबिक, कार्रवाई के दौरान मौके पर शिवपाल सिंह, मांगीलाल धाकड़ उर्फ ‘हरनिया’ और राजेश धाकड़, ये तीनों मौजूद थे। आरोप है कि पुलिस ने कथित लेन-देन कर मांगीलाल उर्फ हरनिया को मौके से ही छोड़ दिया, जबकि राजेश धाकड़ को आरोपी बना दिया गया। इतना ही नहीं, इस कार्रवाई में एक और चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। आरोप है कि राजेश को करीब 4 दिनों तक अवैध रूप से थाने और उसके आसपास रखा गया। जब यह मामला मीडिया की सुर्खियों में आने लगा, तो पुलिस ने आनन-फानन में राजेश को न्यायालय में पेश कर सीधे जेल भेज दिया।
90 लाख के लेन-देन का आरोप, इन पुलिसकर्मियों के नाम आए सामने
इस पूरे घटनाक्रम में सूत्रों द्वारा करीब 90 लाख रुपये के कथित तोड़-बट्टे (डील) का आरोप लगाया जा रहा है। मामले में पुलिसकर्मी कन्हैयालाल सोलंकी, तेजकर जोशी और कारू जाट की भूमिका पर सीधे तौर पर सवाल उठ रहे हैं। साथ ही यह भी सवाल खड़ा हो रहा है कि मुख्य आरोपी बनाए गए शिवपाल सिंह का मोबाइल जब्त कर उसकी कॉल डिटेल और संपर्क सूची से तस्करी के बड़े नेटवर्क को खंगालने की कोशिश क्यों नहीं की गई?
इन बिंदुओं की पड़ताल जरूरी
- जब्ती पंचनामा और मालखाना रजिस्टर: 15 किलो की चर्चा और 6 किलो 182 ग्राम की आधिकारिक जब्ती के बीच के अंतर की जांच।
- गिरफ्तारी मेमो और रोजनामचा: राजेश को 4 दिन तक थाने में रखने और वास्तविक गिरफ्तारी के समय की पुष्टि।
- एनडीपीएस (NDPS) धारा 57 की रिपोर्ट: वरिष्ठ अधिकारियों को गिरफ्तारी और जब्ती की सूचना तय समय पर दी गई या नहीं, इसकी पड़ताल।
- तकनीकी साक्ष्य (CCTV और CDR): थाने के अंदर के सीसीटीवी फुटेज, मौके पर मौजूद सभी लोगों की मोबाइल लोकेशन और संदिग्ध पुलिसकर्मियों की कॉल डिटेल (CDR) व वित्तीय लेन-देन की जांच।
इस पूरे मामले का सच सामने लाने के लिए केवल विभागीय खानापूर्ति के बजाय वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी में इन प्रमुख बिंदुओं पर जांच की मांग उठ रही है। अब देखना यह होगा कि पुलिस विभाग के आला अधिकारी इस मामले में क्या सख्त कदम उठाते हैं ताकि खाकी पर लगे इन दागों की सच्चाई सामने आ सके।
कमलेश सारड़ा की रिपोर्ट
पत्रकारिता में तीन दशक से अधिक का अनुभव.

