
Dhanteras Traditions
आज देशभर में धनतेरस हर्षोल्लास से मन रहा है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व धनत्रयोदशी के नाम से भी जाना जाता है। देशभर में इस दिन सुख-समृद्धि, आरोग्य और खुशहाली की कामना के साथ भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा की जाती है। मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान इसी दिन भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। इसलिए धनतेरस का संबंध केवल धन-संपत्ति से ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और आयुर्वेद से भी जुड़ा है।
इस दिन सोना, चांदी, पीतल और अन्य धातुओं के बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है। कई परिवार नई झाड़ू, चांदी के सिक्के और घरेलू उपयोग की वस्तुएं भी खरीदते हैं। शाम के समय घरों में दीपक जलाए जाते हैं और भगवान धन्वंतरि तथा माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। देश के अलग-अलग हिस्सों में धनतेरस मनाने की परंपराएं काफी रोचक और अनूठी हैं। आइए जानते हैं ऐसी ही कुछ परंपराओं के बारे में।
महाराष्ट्र में धनिया और गुड़ का भोग
महाराष्ट्र में धनतेरस को धनत्रयोदशी कहा जाता है। यहां कई परिवारों में भगवान धन्वंतरि की पूजा के साथ धनिया और गुड़ मिलाकर विशेष नैवेद्य तैयार किया जाता है। इसे माता लक्ष्मी को अर्पित किया जाता है। कुछ परिवारों में नीम की पत्तियां या उनका सेवन करने की भी परंपरा है।
गुजरात में होती है बही-खाता की पूजा
गुजरात में धनतेरस का विशेष महत्व व्यापारिक समुदायों के लिए भी है। यहां कई व्यापारी नई बही-खाता खरीदते हैं और उनकी पूजा करते हैं। व्यापारिक प्रतिष्ठानों में तिजोरी, धन और चांदी के सिक्कों की पूजा की जाती है। नई बही पर स्वास्तिक बनाकर शुभ शुरुआत की कामना की जाती है। गुजरात में खाता-बही की विशेष पूजा को चोपड़ा पूजन की परंपरा से जोड़ा जाता है जो दीपावली के अवसर पर विशेष रूप से होती है।
दक्षिण भारत में औषधि और आयुर्वेद से जुड़ी परंपरा
दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में धनतेरस को भगवान धन्वंतरि की जयंती के रूप में विशेष महत्व दिया जाता है। तमिलनाडु के कुछ पारंपरिक परिवारों में इस अवसर पर ‘मरुंदु’ या ‘लेह्यम’ नामक विशेष औषधीय मिश्रण तैयार किया जाता है। इसमें जीरा, धनिया, अजवाइन, गुड़ और अन्य पारंपरिक सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। इसे स्वास्थ्य और पाचन से जोड़कर देखा जाता है। घरों में चावल के आटे से सुंदर कोलम बनाए जाते हैं और दीपक जलाकर आरोग्य की कामना की जाती है।
उत्तर भारत में यमदीप जलाने की परंपरा
उत्तर भारत में धनतेरस की सबसे महत्वपूर्ण परंपराओं में यमदीपदान शामिल है। इस दिन घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा की ओर दीपक जलाया जाता है। इसे यमराज को समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि यमदीप जलाने से परिवार के सदस्यों को अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है और उनकी लंबी आयु की कामना पूरी होती है। कुछ परिवारों में चार मुख वाला विशेष दीपक जलाने की भी परंपरा है।
बंगाल और ओडिशा में जलाए जाते हैं 13 दीपक
पश्चिम बंगाल में दीपावली के दौरान मां काली की पूजा का विशेष महत्व है। हालांकि, धनतेरस से जुड़ी कुछ क्षेत्रीय परंपराएं भी प्रचलित हैं। बंगाल और ओडिशा के कुछ इलाकों में इस अवसर पर घर के आसपास और तुलसी के पौधे के पास 13 मिट्टी के दीपक जलाने की परंपरा बताई जाती है। कुछ स्थानों पर पूर्वजों के मार्ग को प्रकाश दिखाने की मान्यता के साथ ऊंचे बांस पर आकाशदीप भी लगाया जाता है।
जैन समुदाय में ध्यान और साधना का महत्व
धनतेरस का एक अलग आध्यात्मिक पक्ष जैन समुदाय में भी देखने को मिलता है। यहां इस दिन को ‘ध्यान तेरस’ के रूप में मनाने की परंपरा है। इस अवसर पर ध्यान, साधना, धार्मिक अध्ययन और आत्मचिंतन को महत्व दिया जाता है। इस तरह जहां अधिकांश समुदायों में यह पर्व धन और आरोग्य से जुड़ा है, वहीं जैन परंपरा में इसका संबंध आध्यात्मिक साधना से भी है।
राजस्थान में पशुधन को माना जाता है संपत्ति
राजस्थान के कुछ ग्रामीण इलाकों में धनतेरस की परंपराएं कृषि और पशुधन से जुड़ी हुई हैं। यहां गाय और बैलों को सजाकर उनकी पूजा की जाती है। ग्रामीण जीवन में पशुधन को समृद्धि और आजीविका का महत्वपूर्ण आधार माना जाता रहा है। कुछ क्षेत्रों में महिलाएं कुएं और जलस्रोतों की पूजा कर दीपक जलाती हैं। यह परंपराएं प्रकृति और आजीविका के प्रति उनके सम्मान को दर्शाती हैं।
(डिस्क्लेमर: ये जानकारी विभिन्न स्त्रोतों से ली गई है। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।)
पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (M.J.), 2001. 2001 से 2013 तक ईटीवी हैदराबाद, सहारा न्यूज दिल्ली-भोपाल और लाइव इंडिया मुंबई में कार्य.

