प्रयागराज: उत्तर प्रदेश के संभल में नवंबर 2024 में हुई हिंसा के मामले में फंसे पूर्व सर्किल ऑफिसर (CO) अनुज कुमार चौधरी और अन्य पुलिसकर्मियों को इलाहाबाद हाईकोर्ट से एक बड़ी राहत मिली है। मंगलवार को हुई सुनवाई में हाईकोर्ट ने संभल की CJM कोर्ट के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसमें पुलिस टीम के खिलाफ FIR दर्ज करने का निर्देश दिया गया था।
कोर्ट ने इस मामले में अगली सुनवाई के लिए 24 फरवरी की तारीख तय की है। यह आदेश पुलिस अधिकारी की याचिका पर आया, जिसमें उन्होंने निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट में सरकार ने क्या दलीलें दीं?
इलाहाबाद हाईकोर्ट में सोमवार और मंगलवार को इस मामले पर सुनवाई हुई। राज्य सरकार की ओर से पेश हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) मनीष गोयल ने जोरदार दलीलें पेश कीं। उन्होंने कहा कि संभल के CJM ने FIR का आदेश देते समय कानून की सीमाओं का उल्लंघन किया है।
गोयल ने तर्क दिया कि CJM ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175 के तहत मिले अधिकारों का इस्तेमाल तो किया, लेकिन उन्होंने उन प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का पालन नहीं किया जो सरकारी कर्मचारियों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान अनावश्यक और परेशान करने वाले आपराधिक मामलों से बचाने के लिए बनाए गए हैं।
AAG ने इस बात पर भी जोर दिया कि शिकायतकर्ता ने FIR के लिए सीधे मजिस्ट्रेट के पास अर्जी दी, जबकि कानून के तहत पहले पुलिस स्टेशन जाना एक शर्त है। उन्होंने कहा, “यह फोरम शॉपिंग जैसा है… उन्होंने पुलिस रिपोर्ट के एक हिस्से को लिया और दूसरे को नजरअंदाज कर दिया, जो पूरी तरह से गलत है।” सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि नवंबर 2024 की संभल हिंसा कोई अकेली घटना नहीं थी, बल्कि यह इलाके में हुए एक बड़े हंगामे का हिस्सा थी।
क्या था निचली अदालत का आदेश?
यह पूरा मामला यामीन नामक एक व्यक्ति की शिकायत से शुरू हुआ था। यामीन ने तत्कालीन CJM विभांशु सुधीर की अदालत में एक अर्जी देकर आरोप लगाया था कि 24 नवंबर, 2024 को सुबह लगभग 8.45 बजे उनका बेटा आलम संभल के मोहल्ला कोट में जामा मस्जिद के पास अपने ठेले पर बिस्कुट और रस्क बेच रहा था।
शिकायत के अनुसार, उसी समय कुछ पुलिसकर्मियों ने, जिनमें तत्कालीन थाना इंचार्ज अनुज कुमार तोमर और CO अनुज चौधरी शामिल थे, जान से मारने के इरादे से भीड़ पर गोली चला दी।
इस शिकायत पर सुनवाई करते हुए CJM विभांशु सुधीर ने अपने 11 पन्नों के आदेश में कहा था कि पुलिस आपराधिक कार्यों के लिए ‘आधिकारिक कर्तव्य’ की आड़ नहीं ले सकती। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति पर गोली चलाना सरकारी काम का निर्वहन नहीं माना जा सकता। CJM ने यह पाते हुए कि प्रथम दृष्टया एक संज्ञेय अपराध बनता है, FIR दर्ज कर मामले की जांच का आदेश दिया था। गौरतलब है कि इस आदेश को पारित करने के ठीक एक हफ्ते बाद CJM विभांशु सुधीर का तबादला सुल्तानपुर कर दिया गया था। फिलहाल हाईकोर्ट के रोक के आदेश के बाद पुलिसकर्मियों को फौरी राहत मिल गई है।





