अतिथि विद्वानों पर भड़के मंत्रीजी, बोले- क्या मैं आत्महत्या कर लूं, सीएम से मैं कैसे मिलवाऊं

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भोपाल, डेस्क रिपोर्ट| अपनी मांगों को लेकर लम्बे समय से संघर्ष कर रहे अतिथि विद्वानों (Guest-scholars) पर आज सरकार के मंत्री भड़क गए| उच्च शिक्षा मंत्री मोहन यादव (Minister Mohan Yadav) अतिथि विद्वानों से चर्चा के दौरान तब नाराज हो गए, जब अतिथि विद्वानों ने आत्महत्या की बात कह दी। तमतमाए मंत्रीजी ने कहा कि क्या मैं आत्महत्या कर लूं। वहीं मुख्यमनत्री (Chief minister) से मुलाकात पर कहा मैं कैसे मिलवाऊं?

दरअसल, अपनी मांगों को लेकर अतिथि विद्वान उच्च शिक्षा मंत्री मोहन यादव से चर्चा कर रहे थे| इस दौरान उन्होंने दोबारा नियुक्ति की मांग पूरी करने की मांग मंत्री यादव से करते हुए अपनी पीड़ा जाहिर की और कहा क्या हम आत्महत्या कर लें| इस पर मंत्री ने बेतुका जवाब देते हुए कहा क्या मैं आत्महत्या कर लू, सीएम से मिलवाने पर कहा मैं कैसे मिलवाऊं|

इससे पहले उज्जैन दौरे पर रहे मंत्री मोहन यादव ने कहा था कि हम बाहर हुए अतिथि विद्वानों को व्यवस्था में वापस लेने की तैयारी कर रहे हैं| वहीं अतिथि विद्वानों ने राज्यसभा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया से भी मुलाकात की थी|

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पत्रकारिता पेशा नहीं ज़िम्मेदारी है और जब बात ज़िम्मेदारी की होती है तब ईमानदारी और जवाबदारी से दूरी बनाना असंभव हो जाता है। एक पत्रकार की जवाबदारी समाज के लिए उतनी ही आवश्यक होती है जितनी परिवार के लिए क्यूंकि समाज का हर वर्ग हर शख्स पत्रकार पर आंख बंद कर उस तरह ही भरोसा करता है जितना एक परिवार का सदस्य करता है। पत्रकारिता मनुष्य को समाज के हर परिवेश हर घटनाक्रम से अवगत कराती है, यह इतनी व्यापक है कि जीवन का कोई भी पक्ष इससे अछूता नहीं है। यह समाज की विकृतियों का पर्दाफाश कर उन्हे नष्ट करने में हर वर्ग की मदद करती है। इसलिए पं. कमलापति त्रिपाठी ने लिखा है कि," ज्ञान और विज्ञान, दर्शन और साहित्य, कला और कारीगरी, राजनीति और अर्थनीति, समाजशास्त्र और इतिहास, संघर्ष तथा क्रांति, उत्थान और पतन, निर्माण और विनाश, प्रगति और दुर्गति के छोटे-बड़े प्रवाहों को प्रतिबिंबित करने में पत्रकारिता के समान दूसरा कौन सफल हो सकता है। View all posts by Gaurav Sharma →
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