महिपालपुर मेट्रो स्टेशन का नाम बदलने की याचिका खारिज, दिल्ली HC बोला- ‘यह नीतिगत मामला’

दिल्ली हाईकोर्ट ने निर्माणाधीन महिपालपुर मेट्रो स्टेशन का नाम बदलकर रंगपुरी करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा कि स्टेशनों का नामकरण सरकार का नीतिगत मामला है और वह इसमें दखल नहीं दे सकता। हालांकि, DMRC को 6 हफ्तों में इस पर विचार करने का निर्देश दिया गया है।
Delhi High Court

नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को निर्माणाधीन महिपालपुर मेट्रो स्टेशन का नाम बदलकर ‘रंगपुरी मेट्रो स्टेशन’ करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मेट्रो स्टेशनों का नाम बदलना सरकार और दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC) का नीतिगत और प्रशासनिक मामला है, जिसमें अदालत हस्तक्षेप नहीं कर सकती।

यह याचिका रंगपुरी गांव के रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन द्वारा दायर की गई थी। इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास स्थित रंगपुरी और महिपालपुर दो शहरीकृत गांव हैं। प्रस्तावित स्टेशन दिल्ली मेट्रो के फेज-4 के तहत बन रही गोल्डन लाइन (एयरोसिटी-तुगलकाबाद) का हिस्सा है।

याचिका में क्या थी मांग?

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि स्टेशन के निर्माण के लिए इस्तेमाल की गई अधिकांश जमीन रंगपुरी गांव की है। उन्होंने सरकारी नीति का हवाला देते हुए कहा कि स्टेशन का नाम उसी गांव के नाम पर रखा जाना चाहिए जिसकी जमीन का अधिग्रहण हुआ है। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया था कि जब उन्होंने इस संबंध में अधिकारियों से संपर्क किया, तो वे केवल टालमटोल करते रहे और कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया।

अदालत ने क्या कहा?

जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि किसी भी स्थान या स्टेशन का नामकरण एक नीतिगत निर्णय होता है।

“मेट्रो स्टेशन का नाम रखना सरकार के प्रशासनिक और नीतिगत अधिकार क्षेत्र में आता है, जिसमें कोर्ट तब तक दखल नहीं देता जब तक कि यह मनमाना न हो या संविधान का उल्लंघन न करता हो।”- दिल्ली हाईकोर्ट

इसी टिप्पणी के साथ कोर्ट ने याचिका का निपटारा कर दिया और सीधे तौर पर नाम बदलने का आदेश देने से इनकार कर दिया।

DMRC को विचार करने का निर्देश

हालांकि, याचिका को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को एक छोटी राहत भी दी। जस्टिस कौरव ने DMRC और अन्य संबंधित प्राधिकरणों को निर्देश दिया कि वे इस मामले में याचिकाकर्ताओं द्वारा दी गई अर्जी पर छह सप्ताह के भीतर विचार करें और एक निर्णय लें। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर इस प्रक्रिया में किसी अन्य विभाग की राय की आवश्यकता होती है, तो उसे भी शामिल किया जाना चाहिए।

Shyam Dwivedi
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